Saturday, July 20, 2019

बिछिया का आकर्षण


जब धरती पर स्त्री और पुरुष का अवतरण हुआ तो स्त्री की कोमलता और पुरुष के पुष्ट शरीर की पहचान की उलझन हुई। पुरुष सौन्दर्य का आकांक्षी बना। स्त्री लावण्य की मूर्ति बनी। धरती पर प्रकृति ने जो भी सिरजा पुरुष ने उससे स्त्री के सौन्दर्य को निखारा। धरती का हरा भरा सुकुमार रुप स्त्री के मानस रुप का सिंगार बनी। यही तो अद्भुत है। नारी के भाव संसार के विस्तार में  सोना चाँदी हीरे मोती सबके सब अपनी अमूल्यत्ता को समर्पित करने लगे। यदि कुछ मूल्यवान था तो वह था नारी रुप का समग्र सौन्दर्य जो आभूषण की उपरामता पाकर द्विगुणित हो जाता है।
स्त्री के सौन्दर्य को बढाने में जिस तरह लावण्य और सुडौल देह का महत्व है उसी प्रकार उसके नख से शिख तक के श्रृंगार उसके रुप सौन्दर्य में चार चांद लगा देते हैं। स्त्री के सौन्दर्य में उसकी देह भाषा इठलाना, शर्माना, लज्जा उसके सौन्दर्य के वैभव को बढा देती है। इस नख शिख श्रृंगार में बिछिया की मधुर और मन्द स्वर ध्वनि  रुप के समग्र संसार को स्पन्दित कर देती है।
   संझा के गीत में गाया जाता है -छोटी सी गाडी लुडकती जाये।
जेमे बैठी संझा बाई
बिछिया बजाती जाये।
चूडळो चमकाती जाये।
   विनीता रघुवंशी, हरदा

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