ये बारिश बडी अजीब है
अभी अनमनी सी है
कभी आती है
कभी लौट जाती है
आखिर इसे भी तो
बादलों से बिछड़ने का दुख होगा
तभी जार जार रोती है
कभी बिलखती है
पृथ्वी पर वजूद पटकती है
बाबला बादल अंधा होकर
भटक जाता है तो
बारिश मनाने चली जाती है
बादल के आग़ोश में छुप जाती है
किंतु धरती माँ के स्नेह को
भूलना नामुमकिन है
तो लौट लौट मायके
चार महीने ही तो आती है
स्वरचित:- कुसुम सोगानी

No comments:
Post a Comment