Saturday, July 20, 2019

दूध -धारा

विषय
गौ माता

हाँ माना है माँ तुमने मुझे,
और मैंने जीया है ,
इक विश्वास से यह।
तुम्हारी एक आवाज़ से जब,
बहने लगती थी,
 दूध की धारा मुझमें ।
मैंने तुम्हें माना था ,
बछड़े जैसा अपना।
ओर तुमने किया था,
जननी सा लाड़ मुझे।
पर सवाल मेरे मन में अब,
आते जाते नश्तर चुभोता है,
क्यों मुझको ही तुमने अपने ,
दर पर आने से रोका है ।
समय का चक्र जैसे है चला,
मैं ही दर दर भटकने लगी।
कहाँ मैं मुरली की तीनों। सी थी,
और अब हूँ डर की विधा बनी।
क्यों मेरे बछड़े की सूनी आंखें,
तेरी आँखों को नीर से न भरे।
जब वो भूख है तड़पता,
कैसे तेरे गले से निवाला उतरे ?
फिर जब भी मेरे भीतर की माँ,
लाड़ उसे करना चाहे,
तब तुझे उस पर यूँ ही,
अपने बालक सा लाड़ 
न आ पाए ?
जब भी खींच कर ले जाते है,
दूध की बजाए चमड़ी लेने को,
सूनी आंखें चीत्कार लगाती है,
मत ले जाओ ए मानव,
कुछ दिन मुझे अभी जीने दो।
दूध दिया है मैंने तुझको,
माँस न अपना दे पाऊँगी।
मेरे पीछे मेरे भोले बछड़े को,
बेसहारा कैसे छोड़ पाऊँगी ?
पर तू कभी सुन पाया,
मौन की इन सिसकियों  को।
मैं आज भी तेरे बाज़ारों में,
सामान की तरह बिकती हूँ ।
और खूंखार समय के हाथों,
तड़प तड़प कर रोज़ मरती हूँ ।
मैं अपने लिए कुछ न चाहूँ,
बस विनती करती हूँ तुमसे यह।
मेरे बछड़े को वो जीवन देना ,
जो जी न सकी तेरी होकर मैं।
क्या आटे का एक पेड़ा,
ओर गोवर्धन की गोबर पूजा।
मेरा आस्तितव क्या यही रहा,
क्या तूने मुझे इसलिए पूजा?
मैं तड़प रही हूँ जीने को,
एक अहसास को पीने को।
कि तू कभी हे मानव, 
वो धुन मुरली की छेड़ेगा ।
जिसमें झूमेगी तेरी मानवता,
और मेरा मन आकाश सा झूमेगा।
हाँ आशीर्वाद है मेरा तुझको,
तू सच में मानव बन दिखलाना,
मैं नीर गाय बनने तेरी,
ओर प्रेम से मुझको सहलाना।

स्वरिचत
आदित सिंह भदौरिया।

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