Thursday, July 18, 2019

यादो में नीरज

यादों में नीरज
नहीं हमारे बीच में ,  गोपाल नीरज का शरीर
साहित्य के साक्ष्य हैं , जैसे मीर कबीर

विश्व साहित्याकाश के  देदीप्यमान  नक्षत्र  मा नीरज जी को  हमारी और देश और विश्व साहित्य जगत  की  ओर से हार्दिक विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ ।
    मैं अपनी किताबों को प्रकाशित कराने के लिए मुम्बई से  अलीगढ़ गयी थी और नीरज जी से मिलने की अभिलाषा मन में भी थी । तभी   देवसंयोग से मेरी किताब ' प्रांत पर्व  पयोधि ' उन्हें मिली  और  उसमें मेरा  टेलीफोन नम्बर भी था  ।  उन्होंने   मुझे  फोन कर अपने निवास स्थान पर आमंत्रित किया ।  उनसे अपनत्वपूर्ण संवाद करके ऐसा लगा कि ईश का देवदूत बन धरा   पर आएँ हैं  और मेरे मन की बात जैसे उन्होंने सुन ली हो ।
     मैं  उत्सुकता के साथ  उनसे मिलने अपने हमसफ़र के साथ शाम को उनके घर पँहुची  । साफ - सुथरा सुंदर सुसज्जित उनका बड़ा सा हॉल  था ।जहाँ वे  दो दोस्तों के साथ ताश खेल रहे थे ।  खेल जो तनावों से मुक्त रख के दिमागी कसरत है और अपने आप को व्यस्त रख के मनोरंजन का भी साधन  है । तभी मन में ख्याल आया कि विश्व विख्यात  गीत  कारवां गुजर गया -
 स्वप्न झरे  फूल  से
  मीत चुभे शूल से ।
 जैसे गीतों के रचयिता  किस तरहअपना  समय  खेल के साथ लेखन को समर्पित  कर रखा था । उनकी रचनाओं में जीवन दर्शन , प्रेम , श्रृंगार , विरह  , दर्द , देश प्रेम , देशभक्ति ,मानवता का पैगाम मिलता है । नीरज जी आजादी से पहले  दिल्ली में  सरकारी  कार्यालय में कार्यरत थे । जहाँ उन्हें ब्रिटेनिया सरकार की झूठी प्रशंसा , खूबियों के बारे में लिखना होता था ।जब  कोलकत्ता में  गए तो ब्रिटेनिया   सरकार के विरोध में नज्म लिख दी । तब सरकार इनको पकड़ने के लिए  पीछे पड़ गयी ।  तब  अपने को बचाने  के लिए छिपते - छिपाते कानपुर में आ गए । यहीं पर  कार्यरत हो गए ।
फिर एक दिन उनके मित्र चंद्रा जी मुंबई नगरी ले आए । एक कार्यक्रम में     देवानन्द जी ने उनकी नज्म सुनी तो नीरज जी कलम की तारीफ की । उन्होंने संगीतकार  आर डी बर्मन से मिलवाया ।  तो उन्होंने नीरज को रंगीला शब्द पर गीत लिखने को दिया ।
तब उन्होंने "  रंगीला रे तेरे रंग  में ......" खूब बड़ा गीत लिख दिया । बर्मन जी खूब पसंद आया । इस तरह से फिल्मों में गानों को लिखना सिलसिला चल निकला । गीतों ने कामयाबियाँ , बुलन्दी , यश तो दिया ।लेकिन नीरज जी का मुम्बई में मन  नहीं लगा । खुशियां तलाशने अलीगढ़ आ गए । तब से यहीं परिवार के साथ आकर बस गए । यहाँ उनकी तबीयत खराब रहने लगी । तब भी वे लेखन से जुड़े रहे , कवि सम्मेलनों , हिंदी कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे थे ।  आज वे 93 साल के  हैं । हमारे बीच नहीं हैं । लेकिन अपनी कृतियों साहित्य सेवाओं से हमारे साथ हैं । गीता , ओशो  के विचारों को मानने वाले नीरज जी ने देह त्यागी है ।  आत्मा यहीं भारत में बसी है ।
     मैं उनके खूबसूरत , हँसमुख सरल , सहज , विद्वत्ता , आत्मीयता से पूर्ण व्यक्तित्व  से बहुत प्रभावित हुई ।
अनओपचारिकतापूर्ण  परिवेश में चाय पीकर मेरा परिचय उनसे हुआ । प्रांत पर्व पयोधि  को देख कर मुस्कुराते हुए बोले - बिटिया  देश -प्रेम  जिस की रगों में बहता है , तन - मन समर्पित हो । वही  देश भक्ति मानवीयता का पुजारी होता है । " मेरी कृतियों  के बारे में , मेरी पांडुलिपि दीपक , सृष्टि , अल्बम आदि के बारे में संवाद चला और मेरी उन पांडुलिपियों की समीक्षा भी करके  मुझे अपनी उदारता , निस्वार्थता  , सहज , हितैषी  व्यक्तित्व का परिचय  दिया । इतने महान साहित्यकार अहम कोसो दूर था ।

पांडुलिपियों की समीक्षा कर मुझे आशीर्वाद दिया था । जो आज फल-फूल रहा है ।
 आज वे फोटो के संग अमर पल उनके सानिध्य का स्मरण कर के उनकी आत्मा को शांति मिले  ईश से हम सब  प्रार्थना करते हैं ।
   मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई

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