यादों में नीरज
नहीं हमारे बीच में , गोपाल नीरज का शरीर
साहित्य के साक्ष्य हैं , जैसे मीर कबीर
विश्व साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र मा नीरज जी को हमारी और देश और विश्व साहित्य जगत की ओर से हार्दिक विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ ।
मैं अपनी किताबों को प्रकाशित कराने के लिए मुम्बई से अलीगढ़ गयी थी और नीरज जी से मिलने की अभिलाषा मन में भी थी । तभी देवसंयोग से मेरी किताब ' प्रांत पर्व पयोधि ' उन्हें मिली और उसमें मेरा टेलीफोन नम्बर भी था । उन्होंने मुझे फोन कर अपने निवास स्थान पर आमंत्रित किया । उनसे अपनत्वपूर्ण संवाद करके ऐसा लगा कि ईश का देवदूत बन धरा पर आएँ हैं और मेरे मन की बात जैसे उन्होंने सुन ली हो ।
मैं उत्सुकता के साथ उनसे मिलने अपने हमसफ़र के साथ शाम को उनके घर पँहुची । साफ - सुथरा सुंदर सुसज्जित उनका बड़ा सा हॉल था ।जहाँ वे दो दोस्तों के साथ ताश खेल रहे थे । खेल जो तनावों से मुक्त रख के दिमागी कसरत है और अपने आप को व्यस्त रख के मनोरंजन का भी साधन है । तभी मन में ख्याल आया कि विश्व विख्यात गीत कारवां गुजर गया -
स्वप्न झरे फूल से
मीत चुभे शूल से ।
जैसे गीतों के रचयिता किस तरहअपना समय खेल के साथ लेखन को समर्पित कर रखा था । उनकी रचनाओं में जीवन दर्शन , प्रेम , श्रृंगार , विरह , दर्द , देश प्रेम , देशभक्ति ,मानवता का पैगाम मिलता है । नीरज जी आजादी से पहले दिल्ली में सरकारी कार्यालय में कार्यरत थे । जहाँ उन्हें ब्रिटेनिया सरकार की झूठी प्रशंसा , खूबियों के बारे में लिखना होता था ।जब कोलकत्ता में गए तो ब्रिटेनिया सरकार के विरोध में नज्म लिख दी । तब सरकार इनको पकड़ने के लिए पीछे पड़ गयी । तब अपने को बचाने के लिए छिपते - छिपाते कानपुर में आ गए । यहीं पर कार्यरत हो गए ।
फिर एक दिन उनके मित्र चंद्रा जी मुंबई नगरी ले आए । एक कार्यक्रम में देवानन्द जी ने उनकी नज्म सुनी तो नीरज जी कलम की तारीफ की । उन्होंने संगीतकार आर डी बर्मन से मिलवाया । तो उन्होंने नीरज को रंगीला शब्द पर गीत लिखने को दिया ।
तब उन्होंने " रंगीला रे तेरे रंग में ......" खूब बड़ा गीत लिख दिया । बर्मन जी खूब पसंद आया । इस तरह से फिल्मों में गानों को लिखना सिलसिला चल निकला । गीतों ने कामयाबियाँ , बुलन्दी , यश तो दिया ।लेकिन नीरज जी का मुम्बई में मन नहीं लगा । खुशियां तलाशने अलीगढ़ आ गए । तब से यहीं परिवार के साथ आकर बस गए । यहाँ उनकी तबीयत खराब रहने लगी । तब भी वे लेखन से जुड़े रहे , कवि सम्मेलनों , हिंदी कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे थे । आज वे 93 साल के हैं । हमारे बीच नहीं हैं । लेकिन अपनी कृतियों साहित्य सेवाओं से हमारे साथ हैं । गीता , ओशो के विचारों को मानने वाले नीरज जी ने देह त्यागी है । आत्मा यहीं भारत में बसी है ।
मैं उनके खूबसूरत , हँसमुख सरल , सहज , विद्वत्ता , आत्मीयता से पूर्ण व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई ।
अनओपचारिकतापूर्ण परिवेश में चाय पीकर मेरा परिचय उनसे हुआ । प्रांत पर्व पयोधि को देख कर मुस्कुराते हुए बोले - बिटिया देश -प्रेम जिस की रगों में बहता है , तन - मन समर्पित हो । वही देश भक्ति मानवीयता का पुजारी होता है । " मेरी कृतियों के बारे में , मेरी पांडुलिपि दीपक , सृष्टि , अल्बम आदि के बारे में संवाद चला और मेरी उन पांडुलिपियों की समीक्षा भी करके मुझे अपनी उदारता , निस्वार्थता , सहज , हितैषी व्यक्तित्व का परिचय दिया । इतने महान साहित्यकार अहम कोसो दूर था ।
पांडुलिपियों की समीक्षा कर मुझे आशीर्वाद दिया था । जो आज फल-फूल रहा है ।
आज वे फोटो के संग अमर पल उनके सानिध्य का स्मरण कर के उनकी आत्मा को शांति मिले ईश से हम सब प्रार्थना करते हैं ।
मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई
नहीं हमारे बीच में , गोपाल नीरज का शरीर
साहित्य के साक्ष्य हैं , जैसे मीर कबीर
विश्व साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र मा नीरज जी को हमारी और देश और विश्व साहित्य जगत की ओर से हार्दिक विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ ।
मैं अपनी किताबों को प्रकाशित कराने के लिए मुम्बई से अलीगढ़ गयी थी और नीरज जी से मिलने की अभिलाषा मन में भी थी । तभी देवसंयोग से मेरी किताब ' प्रांत पर्व पयोधि ' उन्हें मिली और उसमें मेरा टेलीफोन नम्बर भी था । उन्होंने मुझे फोन कर अपने निवास स्थान पर आमंत्रित किया । उनसे अपनत्वपूर्ण संवाद करके ऐसा लगा कि ईश का देवदूत बन धरा पर आएँ हैं और मेरे मन की बात जैसे उन्होंने सुन ली हो ।
मैं उत्सुकता के साथ उनसे मिलने अपने हमसफ़र के साथ शाम को उनके घर पँहुची । साफ - सुथरा सुंदर सुसज्जित उनका बड़ा सा हॉल था ।जहाँ वे दो दोस्तों के साथ ताश खेल रहे थे । खेल जो तनावों से मुक्त रख के दिमागी कसरत है और अपने आप को व्यस्त रख के मनोरंजन का भी साधन है । तभी मन में ख्याल आया कि विश्व विख्यात गीत कारवां गुजर गया -
स्वप्न झरे फूल से
मीत चुभे शूल से ।
जैसे गीतों के रचयिता किस तरहअपना समय खेल के साथ लेखन को समर्पित कर रखा था । उनकी रचनाओं में जीवन दर्शन , प्रेम , श्रृंगार , विरह , दर्द , देश प्रेम , देशभक्ति ,मानवता का पैगाम मिलता है । नीरज जी आजादी से पहले दिल्ली में सरकारी कार्यालय में कार्यरत थे । जहाँ उन्हें ब्रिटेनिया सरकार की झूठी प्रशंसा , खूबियों के बारे में लिखना होता था ।जब कोलकत्ता में गए तो ब्रिटेनिया सरकार के विरोध में नज्म लिख दी । तब सरकार इनको पकड़ने के लिए पीछे पड़ गयी । तब अपने को बचाने के लिए छिपते - छिपाते कानपुर में आ गए । यहीं पर कार्यरत हो गए ।
फिर एक दिन उनके मित्र चंद्रा जी मुंबई नगरी ले आए । एक कार्यक्रम में देवानन्द जी ने उनकी नज्म सुनी तो नीरज जी कलम की तारीफ की । उन्होंने संगीतकार आर डी बर्मन से मिलवाया । तो उन्होंने नीरज को रंगीला शब्द पर गीत लिखने को दिया ।
तब उन्होंने " रंगीला रे तेरे रंग में ......" खूब बड़ा गीत लिख दिया । बर्मन जी खूब पसंद आया । इस तरह से फिल्मों में गानों को लिखना सिलसिला चल निकला । गीतों ने कामयाबियाँ , बुलन्दी , यश तो दिया ।लेकिन नीरज जी का मुम्बई में मन नहीं लगा । खुशियां तलाशने अलीगढ़ आ गए । तब से यहीं परिवार के साथ आकर बस गए । यहाँ उनकी तबीयत खराब रहने लगी । तब भी वे लेखन से जुड़े रहे , कवि सम्मेलनों , हिंदी कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे थे । आज वे 93 साल के हैं । हमारे बीच नहीं हैं । लेकिन अपनी कृतियों साहित्य सेवाओं से हमारे साथ हैं । गीता , ओशो के विचारों को मानने वाले नीरज जी ने देह त्यागी है । आत्मा यहीं भारत में बसी है ।
मैं उनके खूबसूरत , हँसमुख सरल , सहज , विद्वत्ता , आत्मीयता से पूर्ण व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई ।
अनओपचारिकतापूर्ण परिवेश में चाय पीकर मेरा परिचय उनसे हुआ । प्रांत पर्व पयोधि को देख कर मुस्कुराते हुए बोले - बिटिया देश -प्रेम जिस की रगों में बहता है , तन - मन समर्पित हो । वही देश भक्ति मानवीयता का पुजारी होता है । " मेरी कृतियों के बारे में , मेरी पांडुलिपि दीपक , सृष्टि , अल्बम आदि के बारे में संवाद चला और मेरी उन पांडुलिपियों की समीक्षा भी करके मुझे अपनी उदारता , निस्वार्थता , सहज , हितैषी व्यक्तित्व का परिचय दिया । इतने महान साहित्यकार अहम कोसो दूर था ।
पांडुलिपियों की समीक्षा कर मुझे आशीर्वाद दिया था । जो आज फल-फूल रहा है ।
आज वे फोटो के संग अमर पल उनके सानिध्य का स्मरण कर के उनकी आत्मा को शांति मिले ईश से हम सब प्रार्थना करते हैं ।
मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई

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