Sunday, July 14, 2019

अथकथा-ए -धारावाहिक



"
अनुपमा अनुश्री
सुनिए ' क' नाम से ,
शुरू होने वाले 
सीरियल्स की 'अथकथा'
कहना बहुत दिनों से,
 दिल चाहता था ।
च्ईगंम की तरह खिंचते
 ये सीरियल्स
क्या ख़ूब पकाते हैं ।


वक़्त बदलता है,
जगह भी बदलती है
साल बदल जाते हैं 
पात्र भी बदल जाते हैं
लोकशंस बदल जाते हैं
देश से विदेश भी पहुंच जाते हैं
लेकिन साल दर साल 
सीन दर सीन
 'वही का वही ' वही का वही ,
  बड़ी शिद्दत से फ़िल्माते हैं
दर्शकों का धैर्य 
जम कर आज़माते हैं।
इन्हें लिखता कौन है 
हम यह सोच -सोच रह जाते हैं।

आम आदमी हिंदुस्तानी
मुश्किलों का मारा, क्या करे 
दफ़्तर से आकर थका हारा 
बैठ जाता है टी.वी के आगे बेचारा।
महिलाएं भी बनाते -बनाते कढ़ी
देखती रहती हैं इनमें  पकते 
षड्यंत्रों की खिचड़ी
बढा देती हैं मज़बूरी में टी.आर .पी।
  

क्या करे दर्शक ,अपने खाने पीने,
 उलझनें सुलझाने की फ़िक्र करे
या इनकी बैंड बज़ाने ,
 बंद करवाने का ज़िक्र करे।
ये तो फ़ायदा उठाये जा रहे हैं 
ख़ूब कमाये जा रहे हैं।
 पद है, पैसा है, ग्लैमर है, 
पात्रों को फिर भी न सुकूं ,न राहत है।


ज़माना कहां से कहां पहुंच रहा
पर इन्हें षडयंत्र ,व्यर्थ प्रपंच
 अभद्रता, बनावटीपन से प्यार है 
कोई नये विषय सूझते नहीं 
इन्हें देखना ख़ुद की और 
देश की सेहत के लिए बेकार है। 
टीवी समाज का आईना है
या टीवी - फ़िल्मों से 
बनता -बिगड़ता समाज है
इस पर शोध की दरकार है ।
सच दोस्तो ! सब जगह ताज़ी 
सुकून देती हवाओं की दरकार है।

© अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'

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