Friday, July 19, 2019

संस्मरण नीरज


नीति अग्निहोत्री
नीरज जी से मैं भी बहुत प्रभावित रही ।देवास के मीना बाजार में हर साल कवि सम्मेलन होता था जिसमे वे  आते थे  और पिताजी हमें कवि सम्मेलन में ले जाते थे । मेरी प्रारंभिक कविताओं में उनका कुछ असर भी रहा है । नीरज जी वाकई  साहित्यकाश मे एक अलग ही खुशबू और रंग  रखते हैं जो दुर्लभ ही है । उनका कविता बोलने का लहजा शब्दों का प्रभाव  और महत्व दुगना कर देता था । आज उनका काव्य संग्रह फिर दीप जलेगा मेरे हाथों में है और इसमें  उनकी पहली कविता की पहली पंक्ति है ं एक दिन भी जी मगर तू ताज बन कर जी ं अटल विश्वास बन कर जी ं अमर विश्वास बन कर जी।सही में  वे कविताओं के मस्तक का ताज बन कर जिए और हमें लुभा कर चले  गये ।उनकी कविताओं का दार्शनिक पक्ष भी सशक्त रहा।उनकी जिजीविषा देखिए ं दिये से  मिटेगा न मन का अंधेरा ं धरा को उठाओ ं गगन को झुकाओ। अंत में यही कहूंगी ऐसी  आत्माएं यदा कदा ही धरती पर आती हैं और दिलो दिमाग पर छा जाती हैं । सादर नमन।

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