धीरे-धीरे पुण्य धरा पर
आ पहुंचा मधुमास
वृक्षों ने परिधान बदलकर
रक्तिम किसलय पाए
बौराई आमों की डाली
महुआ मद बरसाए
घोल रही उपवन में कोयल
पंचम स्वर की मिठास
वासंती चूनर में धरती
इठलाए हर्षाए
केशरिया किंशुक भी निकला
सिर पर पाग लगाए
रंग विपिन में छींट रहे हैं
गुलमोहर अमलतास
फूलों के कानों में तितली
जाने क्या कह जाती
मद्धिम तिरते हंस युगल
जलक्रीड़ा दिखलाते
श्याम मधुप के आलिंगन से
नलिनी लेती विकास
उषा की अरुणिम आभा में
खगकुल गीत सुनाए
चंद्रकिरण की कौमुदी से
रजनी शोभा पाए
मौलश्री रजनीगंधा की
भीनी भीनी सुवास
सरवर में विहँसे नीलोत्पल
मादक मधुॠतु आई
चंचल सुरभित बावरी सी
वासंती पुरवाई
दूर गगन से इस धरती तक
छाया है उल्लास
शर संधान मदन का सृष्टि
अभिसारित हुई सारी
पपीहे की पीहू-पीहू से
हर मन नेह जगा री
बाट पिया की जोह रही वो
विरहन बैठी उदास
-वंदना दुबे

No comments:
Post a Comment