पक्षी/ पंछी
/ चिड़ियाँ पक्षी कहो, पंछी कहो या कह लो चिड़ियाँ, अनमोल पक्षी कहो या कह लो उन्हें परिंदे उन्मुक्त गगन के! आसमान का अभीमान हैं वो, ज़मीन पर रहने वालों के लिए एक प्रेरणा का स्रोतः हैं वो!
उंची लम्बी उड़ान भरने वालें, सबको एक होंसला देने वालें! आईने में अक्सर देख इन्हें मैं हूँ सोचतीं, कितना अथक परिश्रम करतें हैं वो! बार बार गिरतें मगर हार नहीं हैं मानतें वो, सचमुच इनका अक्स भी हमें प्रेरणा ही हैं देता!
आकाश में ऊंची उड़ान भरतें हैं वो, मुक्त गगन में उड़ते हैं वो! सारे बंधनों से परें, मुक्त ऊंचाई को छुटे हैं वो! डरते नहीं चट्टानों से भी,
हर मुश्किल पार ऊपर उड़ते हैं वो! रंग-बिरंगी अद्भुत अद्वितीय हैं वो, हर मौसम में चहचहाटें हैं वो
! बदलतें मौसम में भी नहीं बदलतें हैं वो, हर किसी के मन को हर्षाकर मन मोह लेतें हैं वो!
बरसातों में टहुके भर अपने पंख फैलाकर नाचता हैं मोर, काली होकर भी सुरीली हैं वो कोयल कहलातीं हैं वो! हंस-हंसीनी का जोड़ा प्रेम हैं सिखाता, कौआ अपनी मुर्खता बताकर हमें सीख हैं देता!
सचमुच मुक एवं मासुम होकर भी, कितना कुछ हैं ये सिखातें! सदा सारें पिंजरे तोड़कर उड़ जातें हैं वो, सचमुच कितने निश्चल, निर्मल एवं पवित्र हैं ये लोग!
आज ये मारें जा रहें बिना दया किए, आज ये प्रताड़ित किए जा रहें हैं केवल अपने फायदें के लिए! प्रकृति की शौभा हैं वो मगर आज कैद हैं, हर त्योहार में खुश होकर खुलकर चहचहाने की जगह बेरहमी से मारें जा रहें हैं यह! पशु पक्षी बोल नहीं सकतें, इसीलियें दुःख सहते हैं!
हम इंसानों का बोलने पर संयम नहीं हैं, इसलियें हम स्वयं ही दुःख को निमंत्रण देतें हैं!
उठ जाग जा इंसान, खुद को बदलले इंसान! मत कर इनपर हमला, कुछ होश संभाल लें इंसान!
©दिपशीखा अग्रवाल! 😍
/ चिड़ियाँ पक्षी कहो, पंछी कहो या कह लो चिड़ियाँ, अनमोल पक्षी कहो या कह लो उन्हें परिंदे उन्मुक्त गगन के! आसमान का अभीमान हैं वो, ज़मीन पर रहने वालों के लिए एक प्रेरणा का स्रोतः हैं वो!
उंची लम्बी उड़ान भरने वालें, सबको एक होंसला देने वालें! आईने में अक्सर देख इन्हें मैं हूँ सोचतीं, कितना अथक परिश्रम करतें हैं वो! बार बार गिरतें मगर हार नहीं हैं मानतें वो, सचमुच इनका अक्स भी हमें प्रेरणा ही हैं देता!
आकाश में ऊंची उड़ान भरतें हैं वो, मुक्त गगन में उड़ते हैं वो! सारे बंधनों से परें, मुक्त ऊंचाई को छुटे हैं वो! डरते नहीं चट्टानों से भी,
हर मुश्किल पार ऊपर उड़ते हैं वो! रंग-बिरंगी अद्भुत अद्वितीय हैं वो, हर मौसम में चहचहाटें हैं वो
! बदलतें मौसम में भी नहीं बदलतें हैं वो, हर किसी के मन को हर्षाकर मन मोह लेतें हैं वो!
बरसातों में टहुके भर अपने पंख फैलाकर नाचता हैं मोर, काली होकर भी सुरीली हैं वो कोयल कहलातीं हैं वो! हंस-हंसीनी का जोड़ा प्रेम हैं सिखाता, कौआ अपनी मुर्खता बताकर हमें सीख हैं देता!
सचमुच मुक एवं मासुम होकर भी, कितना कुछ हैं ये सिखातें! सदा सारें पिंजरे तोड़कर उड़ जातें हैं वो, सचमुच कितने निश्चल, निर्मल एवं पवित्र हैं ये लोग!
आज ये मारें जा रहें बिना दया किए, आज ये प्रताड़ित किए जा रहें हैं केवल अपने फायदें के लिए! प्रकृति की शौभा हैं वो मगर आज कैद हैं, हर त्योहार में खुश होकर खुलकर चहचहाने की जगह बेरहमी से मारें जा रहें हैं यह! पशु पक्षी बोल नहीं सकतें, इसीलियें दुःख सहते हैं!
हम इंसानों का बोलने पर संयम नहीं हैं, इसलियें हम स्वयं ही दुःख को निमंत्रण देतें हैं!
उठ जाग जा इंसान, खुद को बदलले इंसान! मत कर इनपर हमला, कुछ होश संभाल लें इंसान!
©दिपशीखा अग्रवाल! 😍

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