![]() |
| वासुंंमती चतुर्वेदी |
झर निर्झर , नव पल्लवित , सुकुसुमित , हो हर्षित ,
धर सिंगार नव यौवना का ---- धरा ये सुगंधित ,
दे रही मानो मौन आमंत्रण ,
------- बुहारे है पथ हमने
नूतन किसलय से ,
खोल गवाक्ष -- चल उड़ साथ मेरे ,
रहा पुकार ये नीलाम्बर -- मुक्ताकाश ,
छू तू ऊंचाइयां नभ की ,
करके मुक्त स्वयं को ,
बंधनों से ,
क्योंकि उत्सव है ये नव अंकुर का ,
नव संचार का ,
बासन्ती हर्षोल्लास का ।

No comments:
Post a Comment