*"बसंत पंचमी'*
हे ऋतुराज,
ले बसंत बहार,
पीली सरसों फैली,
धानी चुनरिया ओढ़े,
तितली पंख फैलाये,
कोयल कुहू कुहू बोले,
अमवा में आये बौर,
लटकते हुए खट्टे मीठे बेर,
ली मौसम ने अंगड़ाई,
धरती ने घूँघट ओढ़ ली,
फागुन के बासंती गीत लिए,
खुशियां चहुँ ओर फैला हुआ,
छेड़े तान सुरीली आवाज में,
भौरें का गुंजन शोर लिए,
वादियों का नव सृजन हुआ,
लो बसंत पंचमी का आगमन हुआ।
*शशिकला व्यास*
हे ऋतुराज,
ले बसंत बहार,
पीली सरसों फैली,
धानी चुनरिया ओढ़े,
तितली पंख फैलाये,
कोयल कुहू कुहू बोले,
अमवा में आये बौर,
लटकते हुए खट्टे मीठे बेर,
ली मौसम ने अंगड़ाई,
धरती ने घूँघट ओढ़ ली,
फागुन के बासंती गीत लिए,
खुशियां चहुँ ओर फैला हुआ,
छेड़े तान सुरीली आवाज में,
भौरें का गुंजन शोर लिए,
वादियों का नव सृजन हुआ,
लो बसंत पंचमी का आगमन हुआ।
*शशिकला व्यास*

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