रंग बसंती का खिला है ऐसे,
जग सारा रंगीन हो गया।
पर कब तक खिले रहेंगे ये फूल,
ये प्रश्न भी संगीन हो गया।
न भूलो तुम उन रस्मों को,
जिनसे बंधा है कल तुम्हारा।
न खो दो तुम इन रस्मों को,
जो है हर उत्तर तुम्हारा।
पीला, नारंगी हो या हरा,
सब रंग खेलते है मुस्कानों से।
बाधँना पड़ता है माली को,
मिट्टी के गीले धागों से।
अपना रंग मटमैला करके ही,
खिलाना है वो फूल नया।
जो रंग भर आँखों से होकर रूह में,
वो देता है स्वप्न नया।
तो खिल जाओ तुम भी मटमैला होकर।
ये मिट्टी ही जीवन था,
ना भूलो तुम कर्ज इसका।
आदिति भदोरिया

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