वसन्त ऋतुओं का राजा
आज 29 जनवरी 2020 वसन्त पंचमी का महापर्व है संग विद्या , बुद्धि , वाणी की देवी सरस्वती माँ का पूजन और 1फरवरी को हिंदी चेतना के सशक्त कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी का जन्मोत्सव है ।
आज बसन्त पंचमी पर्व है ।
सभी बच्चों , बड़ों हर किसी के जीवन में इस पर्व का महत्व है ज्ञान के दृष्टिकोण से । सभी जन , मन सरस्वती की इन प्रार्थनाओं में वंदना करते हैं । सभी को सदबुध्दि दे । ऐसी मैं कामना करती हूँ ।
या देवी सर्वभूतेषु सरस्वती रूपेण संस्थिता
नमस्त्स्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
वर दे वीणा वादिनी वर दे ।
या कुन्देन्दु तुषार धार धवला
मां सरस्वती ज्ञान , कला विज्ञान की देवी है । जो हम सब में ज्ञान का संचार करती है । सभी देवी माँ सरस्वती की पूजा करते हैं । हरियाली के नवांकुर , मादक फूलों से नवश्रृंगार से प्रकृति में चहुँ ओर वंसत छाया हुआ है । पीले परिधान पहन के , मीठे पीले चावलों को माँ सरस्वती का भोग लगा के पूजन किया जाता है ।
बद्रीनाथ के कपाट खुलने की तिथि इसी दिन देखी जाती है ।
बसंत को यदि में कामदेव का पर्याय कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । शिव के कोप से कामदेव भस्म होकर या प्रकृति में अंनग रूप बिखेरते हैं ।कहते भी हैं , " आई बसन्त की पाँचे , बूढी डुकरिया नाचे । " बसन्त की खूबसूरती तो लाजवाब , बेमिसाल है । कामदेव की जिस पर पर भी नजर पड़ जाए तो वे अपनी सुधबुद खो देता है । कली भी उस पल खिलनेवाली है तो वह भी संयमित हो जाती है , तरकश से निकलनेवाला तीर भी बाहर नहीं निकल पाता । ये सारी प्राकृतिक गतिविधि उसके रूप में सम्मोहित हो जाती है । जो संतुलन , अनुशासन , धैर्य का पैगाम देती हैं , आशा , नवपल्लवित जीवन का भी । मस्त मलय की मंद , मंद शीतल महकती , महकाती स्वास्थ्यवर्द्धक पवन चराचर में अपना जादू बिखेरती है । प्रकृति की गोद में खेतों में लहलहाती पीलें पुष्पों से पल्लवित नवयौवना सरसों अपना आँचल पसार के वंसत में समाहित हो के कौमदी उत्सव मनाती है ।
मुझे अपना बचपन याद आ गया । संसार का तीर्थ धाम हमारे नगर ऋषिकेश , उत्तराखण्ड में वंसत पंचमी का मेला लगता था । अब नहीं लगता शायद । तब उस नगर के सारे निवासी हिन्दू , मुस्लिम सिख , पंजाबी , पहाड़ी , गढ़वाली आदि सारे अनेकता में एकता की मिसाल कायम कर बड़े उत्साह , जोश के साथ पीले परिधानों में साज , सँवर के इस पर्व को हर्ष , उल्लास से मनाते थे ।महीनों पहले से नगर में उत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती थी । हिंडोले लग जाते थे । लघु भारत इस उत्सव में दिखाई देता था । गटाइलायचीवाला रंगीन खांड से चिड़िया , बत्तख बनाके छोटे , बड़ों को लुभाता था । पीपनी की पी , पी का मीठा शोर कर्णप्रिय लगता था । बच्चों के वाटर बम पर टप्पे मारते हाथ , रंग बिरंगी गुब्बारे फुलाते गाल , माता पिता के संग हाथ पकड़े रोते , हँसते छोटे बच्चे , बड़े, युवा , स्त्री , पुरुष मनोरंजन के साथ प्रेम , सौहार्द्र , सद्भाव , सामाजिक समरसता की मिसाल थी । नस्ल , वर्ण , जातीयता , प्रांतीयता का भेदभाव की कोई लकीर खींची नहीं थी ।
आज का शैशव दोस्तों के संग साथ इन चीजों से , आउट डोर मनोरंजन से दूर इनडोर ऑन लाइन खेलों में व्यस्त है । वे क्या जाने वसंत पंचमी महोत्सव और 64 कलाओं वाली विद्या की देवी सरस्वती माँ का पूजन । हर स्कूल , हर घर में सरस्वती पूजन किया जाता था । जिससे विद्या की देवी की कृपा सभी जड़ चेतन पर बरसती रहे ।
इस पावन दिन ऋषिकेश उत्तराखण्ड के महंत जी के 'भरत मंदिर ' में विराजे प्रभु राम जी के छोटे भाई भरत के माथे पर हीरे जड़ित टीका से सज्जित भरत जी की मूर्ति को पालकी में बिठाकर पतित पावनी गंगा जी परिक्रमा कराई जाती थी । वहां पर किवंदन्ति भी है कि राम रावण युद्ध में रावण को मार के जब राम , लक्ष्मण , भरत , शत्रुघ्न चारों भाई राक्षस हत्या के पाप का प्रायश्चित करने के लिए ऋषिकेश के गंगा तट पर आए थे । शायद यह भी कारण हो सकता है भरत जी की गंगा परिक्रमा का महत्त्व ।
तब सारे नगरवासी इस पावन पुण्य महोत्सव का बैचेनी से इंतजार करते थे । हर कोई इस अवसर का पुण्य लेने का लाभ उठाने के लिए भरत जी की सवारी का दर्शन करता था और गुड़ की भेली ,रुपये , पीले मीठे चावल का भोग लगा कर भेंट चढ़ाते थे । हम सब भाई , बहन माँ , पिता के साथ भीड़ भरे परिवेश में भरत जी का आशीर्वाद , दर्शनाभिलाषा को पूर्ण करते थे ।
जनमानस अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने की दरखास्त की अर्जी भी भरत जी से लगाते थे । कितनी आपाधापी में श्रद्धालुओं की भीड़ होती थी ।
आरती के थाल सजाए पंडे , पुरोहित, भक्तगण गंगा जी की , भरत जी की आरती कर , दीप दान , फूलों को पत्तों के दोने में सजाकर गंगा की धाराओं में प्रवाहित कर मनोरम दिव्य दृश्य का चित्रण बहुत मनहारी लगता है । सस्वर पाठ में गंगा आरती " जय गंगा मैया स्वामी जी गंगा मैया " की जाती है
प्राकृतिक नजारों से सराबोर , शैक्षिक स्थली ज्ञान आध्यात्म से समृद्ध बनी रहे । इसलिए इसी दिन वहाँ के गंगा तट पर सरस्वती का भी पूजन होता है । जिसका प्रभाव साफ दृष्टिगोचर हुआ है । देश , विदेशो में डॉक्टर , इंजीनियर , वकील , प्रशासनिक सेवाओं में आई ए एस जैसे हमारे बड़े भाई स्व विजय , नवनीत आदि प्रबुध्द छात्रों ने ऋषिकेश का नाम रोशन किया है । वहीं के महंत शांतिप्रपन शर्मा जी उत्तरप्रदेश के मंत्री रहे । तब उत्तराखण्ड राज्य नहीं बना था । उत्तरप्रदेश था । मेरे संस्कारों की जन्मभूमि ऋषिकेश है । जिसका ऋण कभी नहीं चुका सकती ।
हमारे पिताजी ऋषिकेश में शैक्षिक क्रान्ति के जनक कहलाए जाते हैं । ज्ञान की देवी सरस्वती के वे उपासक थे । सरस्वती की कृपा से वे हिंदी , अंग्रेजी , उर्दू के भाषाविज्ञ थे , कुशल वक्ता , लेखन सृजन से गढ़ा व्यक्तित्व , कृतित्व था । उनकी कृपा सभी विद्यार्थियों पर बरसी । ये इसलिए कलम चली कि आज की पीढ़ी इन पर्वो का गौरव को जाने और माने ।
सरस्वती पूजन का महत्त्व इसलिए भी है कि ज्ञान , सुमति के बिन तो जीवन में अँधेरा है । विद्या की देवी सरस्वती ज्ञान उजियारा करती है क्योंकि एक शिक्षित बाल , बालिका बनेंगे। जो परिवार , समाज , देश , जगत का व्यवस्थित दीपक है। यही बाल दीप बड़े होकर करेगा दिवाली सा सर्जन का प्रकाश । अगर कुमती अव्यवस्थित हो तो अंहकार , संकीर्णता अज्ञान का होगा सृजन ।जो होगी होलिका की आग- सी संहारक ।
सरस्वती माँ के सम्मुख छोटे बच्चे प्रथम अक्षर ज्ञान का सीखते हैं । जिसका उदाहरण है हमारी बड़ी दीदी का सुपुत्र छोटू उर्फ़ सौरभ ।जिसको लेकर मैं , माँ , पिताजी यानी नाना , नानी के साथ हम ऋषिकेश के अपने घर के पिछवाड़े के कान्वेंट स्कूल में बसंत पंचमी के दिन उसका दाखिला कराया । वहीं उसकी शिक्षा की नींव गढ़ी थी । आज वह सफल , मेधावी होनहार कंम्प्यूटर इंजीनियर बंगलोर में है ।
हेमंत , शिशिर की सर्द सर्दी बसन्त से डर से गायब जाती है ।कृष्ण ने भी इस बसन्त की प्रशंसा की है -
"मैं ऋतुओं में बसन्त हूँ । "
आध्यात्मिक , सामाजिक समरसता , उमंग - उल्लास के इस महापर्व पर सभी को मेरी शुभकामनाएं ।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई
आज 29 जनवरी 2020 वसन्त पंचमी का महापर्व है संग विद्या , बुद्धि , वाणी की देवी सरस्वती माँ का पूजन और 1फरवरी को हिंदी चेतना के सशक्त कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी का जन्मोत्सव है ।
आज बसन्त पंचमी पर्व है ।
सभी बच्चों , बड़ों हर किसी के जीवन में इस पर्व का महत्व है ज्ञान के दृष्टिकोण से । सभी जन , मन सरस्वती की इन प्रार्थनाओं में वंदना करते हैं । सभी को सदबुध्दि दे । ऐसी मैं कामना करती हूँ ।
या देवी सर्वभूतेषु सरस्वती रूपेण संस्थिता
नमस्त्स्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
वर दे वीणा वादिनी वर दे ।
या कुन्देन्दु तुषार धार धवला
मां सरस्वती ज्ञान , कला विज्ञान की देवी है । जो हम सब में ज्ञान का संचार करती है । सभी देवी माँ सरस्वती की पूजा करते हैं । हरियाली के नवांकुर , मादक फूलों से नवश्रृंगार से प्रकृति में चहुँ ओर वंसत छाया हुआ है । पीले परिधान पहन के , मीठे पीले चावलों को माँ सरस्वती का भोग लगा के पूजन किया जाता है ।
बद्रीनाथ के कपाट खुलने की तिथि इसी दिन देखी जाती है ।
बसंत को यदि में कामदेव का पर्याय कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । शिव के कोप से कामदेव भस्म होकर या प्रकृति में अंनग रूप बिखेरते हैं ।कहते भी हैं , " आई बसन्त की पाँचे , बूढी डुकरिया नाचे । " बसन्त की खूबसूरती तो लाजवाब , बेमिसाल है । कामदेव की जिस पर पर भी नजर पड़ जाए तो वे अपनी सुधबुद खो देता है । कली भी उस पल खिलनेवाली है तो वह भी संयमित हो जाती है , तरकश से निकलनेवाला तीर भी बाहर नहीं निकल पाता । ये सारी प्राकृतिक गतिविधि उसके रूप में सम्मोहित हो जाती है । जो संतुलन , अनुशासन , धैर्य का पैगाम देती हैं , आशा , नवपल्लवित जीवन का भी । मस्त मलय की मंद , मंद शीतल महकती , महकाती स्वास्थ्यवर्द्धक पवन चराचर में अपना जादू बिखेरती है । प्रकृति की गोद में खेतों में लहलहाती पीलें पुष्पों से पल्लवित नवयौवना सरसों अपना आँचल पसार के वंसत में समाहित हो के कौमदी उत्सव मनाती है ।
मुझे अपना बचपन याद आ गया । संसार का तीर्थ धाम हमारे नगर ऋषिकेश , उत्तराखण्ड में वंसत पंचमी का मेला लगता था । अब नहीं लगता शायद । तब उस नगर के सारे निवासी हिन्दू , मुस्लिम सिख , पंजाबी , पहाड़ी , गढ़वाली आदि सारे अनेकता में एकता की मिसाल कायम कर बड़े उत्साह , जोश के साथ पीले परिधानों में साज , सँवर के इस पर्व को हर्ष , उल्लास से मनाते थे ।महीनों पहले से नगर में उत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती थी । हिंडोले लग जाते थे । लघु भारत इस उत्सव में दिखाई देता था । गटाइलायचीवाला रंगीन खांड से चिड़िया , बत्तख बनाके छोटे , बड़ों को लुभाता था । पीपनी की पी , पी का मीठा शोर कर्णप्रिय लगता था । बच्चों के वाटर बम पर टप्पे मारते हाथ , रंग बिरंगी गुब्बारे फुलाते गाल , माता पिता के संग हाथ पकड़े रोते , हँसते छोटे बच्चे , बड़े, युवा , स्त्री , पुरुष मनोरंजन के साथ प्रेम , सौहार्द्र , सद्भाव , सामाजिक समरसता की मिसाल थी । नस्ल , वर्ण , जातीयता , प्रांतीयता का भेदभाव की कोई लकीर खींची नहीं थी ।
आज का शैशव दोस्तों के संग साथ इन चीजों से , आउट डोर मनोरंजन से दूर इनडोर ऑन लाइन खेलों में व्यस्त है । वे क्या जाने वसंत पंचमी महोत्सव और 64 कलाओं वाली विद्या की देवी सरस्वती माँ का पूजन । हर स्कूल , हर घर में सरस्वती पूजन किया जाता था । जिससे विद्या की देवी की कृपा सभी जड़ चेतन पर बरसती रहे ।
इस पावन दिन ऋषिकेश उत्तराखण्ड के महंत जी के 'भरत मंदिर ' में विराजे प्रभु राम जी के छोटे भाई भरत के माथे पर हीरे जड़ित टीका से सज्जित भरत जी की मूर्ति को पालकी में बिठाकर पतित पावनी गंगा जी परिक्रमा कराई जाती थी । वहां पर किवंदन्ति भी है कि राम रावण युद्ध में रावण को मार के जब राम , लक्ष्मण , भरत , शत्रुघ्न चारों भाई राक्षस हत्या के पाप का प्रायश्चित करने के लिए ऋषिकेश के गंगा तट पर आए थे । शायद यह भी कारण हो सकता है भरत जी की गंगा परिक्रमा का महत्त्व ।
तब सारे नगरवासी इस पावन पुण्य महोत्सव का बैचेनी से इंतजार करते थे । हर कोई इस अवसर का पुण्य लेने का लाभ उठाने के लिए भरत जी की सवारी का दर्शन करता था और गुड़ की भेली ,रुपये , पीले मीठे चावल का भोग लगा कर भेंट चढ़ाते थे । हम सब भाई , बहन माँ , पिता के साथ भीड़ भरे परिवेश में भरत जी का आशीर्वाद , दर्शनाभिलाषा को पूर्ण करते थे ।
जनमानस अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने की दरखास्त की अर्जी भी भरत जी से लगाते थे । कितनी आपाधापी में श्रद्धालुओं की भीड़ होती थी ।
आरती के थाल सजाए पंडे , पुरोहित, भक्तगण गंगा जी की , भरत जी की आरती कर , दीप दान , फूलों को पत्तों के दोने में सजाकर गंगा की धाराओं में प्रवाहित कर मनोरम दिव्य दृश्य का चित्रण बहुत मनहारी लगता है । सस्वर पाठ में गंगा आरती " जय गंगा मैया स्वामी जी गंगा मैया " की जाती है
प्राकृतिक नजारों से सराबोर , शैक्षिक स्थली ज्ञान आध्यात्म से समृद्ध बनी रहे । इसलिए इसी दिन वहाँ के गंगा तट पर सरस्वती का भी पूजन होता है । जिसका प्रभाव साफ दृष्टिगोचर हुआ है । देश , विदेशो में डॉक्टर , इंजीनियर , वकील , प्रशासनिक सेवाओं में आई ए एस जैसे हमारे बड़े भाई स्व विजय , नवनीत आदि प्रबुध्द छात्रों ने ऋषिकेश का नाम रोशन किया है । वहीं के महंत शांतिप्रपन शर्मा जी उत्तरप्रदेश के मंत्री रहे । तब उत्तराखण्ड राज्य नहीं बना था । उत्तरप्रदेश था । मेरे संस्कारों की जन्मभूमि ऋषिकेश है । जिसका ऋण कभी नहीं चुका सकती ।
हमारे पिताजी ऋषिकेश में शैक्षिक क्रान्ति के जनक कहलाए जाते हैं । ज्ञान की देवी सरस्वती के वे उपासक थे । सरस्वती की कृपा से वे हिंदी , अंग्रेजी , उर्दू के भाषाविज्ञ थे , कुशल वक्ता , लेखन सृजन से गढ़ा व्यक्तित्व , कृतित्व था । उनकी कृपा सभी विद्यार्थियों पर बरसी । ये इसलिए कलम चली कि आज की पीढ़ी इन पर्वो का गौरव को जाने और माने ।
सरस्वती पूजन का महत्त्व इसलिए भी है कि ज्ञान , सुमति के बिन तो जीवन में अँधेरा है । विद्या की देवी सरस्वती ज्ञान उजियारा करती है क्योंकि एक शिक्षित बाल , बालिका बनेंगे। जो परिवार , समाज , देश , जगत का व्यवस्थित दीपक है। यही बाल दीप बड़े होकर करेगा दिवाली सा सर्जन का प्रकाश । अगर कुमती अव्यवस्थित हो तो अंहकार , संकीर्णता अज्ञान का होगा सृजन ।जो होगी होलिका की आग- सी संहारक ।
सरस्वती माँ के सम्मुख छोटे बच्चे प्रथम अक्षर ज्ञान का सीखते हैं । जिसका उदाहरण है हमारी बड़ी दीदी का सुपुत्र छोटू उर्फ़ सौरभ ।जिसको लेकर मैं , माँ , पिताजी यानी नाना , नानी के साथ हम ऋषिकेश के अपने घर के पिछवाड़े के कान्वेंट स्कूल में बसंत पंचमी के दिन उसका दाखिला कराया । वहीं उसकी शिक्षा की नींव गढ़ी थी । आज वह सफल , मेधावी होनहार कंम्प्यूटर इंजीनियर बंगलोर में है ।
हेमंत , शिशिर की सर्द सर्दी बसन्त से डर से गायब जाती है ।कृष्ण ने भी इस बसन्त की प्रशंसा की है -
"मैं ऋतुओं में बसन्त हूँ । "
आध्यात्मिक , सामाजिक समरसता , उमंग - उल्लास के इस महापर्व पर सभी को मेरी शुभकामनाएं ।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई

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