Wednesday, January 29, 2020

अनुभूति

शीला  वर्मा 
जो कह दिया वह *शब्द* थे ;
      जो नहीं कह सके 
             वो *अनुभूति* थी ।।
और, 
     जो कहना है मगर ;
           कह नहीं सकते, 
                  वो *मर्यादा* है ।।

*बात पर गौर करना*- ----

*पत्तों* सी होती है 
        कई *रिश्तों की उम्र*, 
आज *हरे*-------!
कल *सूखे* -------!

क्यों न हम, 
*जड़ों* से; 
रिश्ते निभाना सीखें ।।

रिश्तों को निभाने के लिए, 
कभी *अंधा*,
कभी *गूँगा*,
    और कभी *बहरा* ;
            होना ही पड़ता है ।।

*बरसात* गिरी 
  और *कानों* में इतना कह गई कि---------!
*गर्मी* हमेशा 
        किसी की भी नहीं रहती ।।

*नसीहत*, 
             *नर्म लहजे* में ही 
               अच्छी लगती है ।

क्योंकि, 

*दस्तक का मकसद*, 
    *दरवाजा* खुलवाना होता है; 
                         तोड़ना नहीं ।।

*घमंड*-----------! 
किसी का भी नहीं रहा, 
*टूटने से पहले* ,
*गुल्लक* को भी लगता है कि ;

*सारे पैसे उसी के हैं* ।

जिस बात पर ,
कोई *मुस्कुरा* दे;
बात --------!
बस वही *खूबसूरत* है ।।

थमती नहीं, 
     *जिंदगी* कभी, 
          किसी के बिना ।।

मगर, 
         यह *गुजरती* भी नहीं, 
                 अपनों के बिना ।।

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