Thursday, January 30, 2020

शालनी रायजादा 
ओढ़े चादर पीताम्बरी ,

झर निर्झर , नव पल्लवित , सुकुसुमित , हो हर्षित ,


धर सिंगार नव यौवना का ---- धरा ये सुगंधित ,

दे रही मानो मौन आमंत्रण ,

------- बुहारे है पथ हमने

नूतन किसलय से ,

खोल गवाक्ष -- चल उड़ साथ मेरे ,

रहा पुकार ये नीलाम्बर -- मुक्ताकाश ,

छू तू ऊंचाइयां नभ की ,

करके मुक्त स्वयं को ,

बंधनों से ,

क्योंकि उत्सव है ये नव अंकुर का ,

नव संचार का ,

बासन्ती हर्षोल्लास का ।

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