समाचार दर्पण,14 नवम्बर
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(बाल दिवस पर विशेष रिपोर्ट )
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*डा. सुनीता श्रीवास्तव (विशेष प्रतिनिधी)
स्वतंत्र भारत ने पंडित जवाहरलाल नेहरु के जन्मदिन को बालदिवस का रुप भले ही दिया हो पर मानवीय स्तर पर वह बच्चों के साथ न्याय करने मे अक्षम रहा है ,कारण कोई भी हो पर यह एक कडवा सच हैं कि खामोश बचपन अब सिसक रहा हैं ।सर्वेक्षण के आधार पर साबित होता हैं कि तमाम भौतिक सुख सुविधाओं के वावजूद आज बचपन पीडित हैं हर क्षेत्र में ।पर्ट के आधार प्रतिमा अकेले इंदौर शहर में एक साल में 478 रिपोर्ट दर्ज हुई जिसमे से 467 पर कोई एक्शन ही नही हुआ क्योकी शिकायतकर्ता खुद ने आगे बड़ने से इन्कार कर दिया ।जब पुलिस की फाइल से कुछ लोगो से पूछताछ की तो निम्न बिंदू सामने आये--
1-अभी एक्शन लने पर धमकी मिल रही हैं बेहतर हैं हम चुप हो जाए क्योकी कोई साथ तो देगा नही बस कागजी कार्यवाही चलती रहेगी जो होना था वो हो चुका।
2-सामने वाले ने सक्षम अधिकारी को खिलापिला दिया।
3-बार बार कचहरी के चक्कर में लगाने पड रहे हैं समय नही हैं ।
4-कोई सुनने वाला नही है ।
5-सबूत ही खत्म कर दिये
यह तो वो कारण हैं जो बच्चों के साथ गल्त हादसो के बाद पता चलने पर किये गये पर कई किस्से तो बच्चे खुद ही नही बताते है और उनमें 89%स्वयं परिवार के लोग ही जिम्मेदार होते है जो एक दुखद पहलू हैं ।
इंदौर शहर में इस समय 59 बालअनाथ आश्रम चल रहे है जो मान्य हैं पर वहा भी अन्दरूनी हालत सही नही हैं ,कहने के लिय कई सामाजिक संस्था उनको आर्थिक सुविधाएं प्रदान करती हैं पर उनका सही उपयोग नही होता हैं अभी हाल की ही बात हैं इंदौर की एक प्रसिध्द बालाश्रम में पित्रपक्ष में कुछ दान स्वरुप फल आदी लेकर जाना हुआ बातचीत अधिकारियो से चल रही थी तभी एक परिवार के लोग अपने पिताश्री के श्राद्ध में कुछ कीमती सामान आकर दे गये ,उनके जाने के बाद वो सामान तुरंत संचालक के घर पहुँचा दिया गया जब पुछा तो कहा गया एसा उनको करने का निर्देशन है वरना सेवानिवृत्त कर दिये जाते है मन कडवाहट से भर गया और लगा अपना सामान झुग्गी-झोपड़ी मे ही दे दो तो बेहतर है ।
नन्ही नन्ही बच्चियों के साथ परिवार के लोग ही उनका शोषण करते हैं जिसका ग्राफ बडा हैं ,पर आजकल लड़के लोग भी हवस का शिकार हो रहे है इंदौर के प्रसिध्द उधोगपति द्वारा संचालित बालाश्रम में जब महाराष्ट्र से आये तीन भागे बच्चे पकडा गए तो उनका यही कहना था की वार्ड्न पुरुष उनको रात में परेशान करता था ।
इंदौर की एक बालाश्रम में तो कुछ बच्चे बड़े लोगो की नाजायज निशानी हैं सबसे मजे की बात यहा के कर्मचारी भी इतने नालायक हो गए है कि खुलेआम सौदा करते है इसका एक दूसरा पहलू चोकाने वाला भी था जब साथ के एक रिपोर्टे जो ट्रेनर था उसे बालाश्रम के एक कर्मचारी ने कहा - यह तो आपका बच्चा है उस बच्चे के नाक नकक्ष भी मिला दिये,(मतलब आप कदम रखे तो सम्हलकर)
यह हम भारतीयो का आधुनिक समाज का मन है ।
निसन्देह यह एक गम्भीर मामला है जो पेचिदा हैं जिसे धेर्य के साथ समाज के हर पहलू से मनन करना होगा ।

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