![]() |
| कुसुम सोगनी |
ना चाँदनी की बात की - अमृत जो छलका होगा चखने की सौगात थी
ऐ चाँद तुम इतराओ न तुमसे ज़्यादा ख़ूबसूरत मिलन की कायनात सी एक न बीते सी घड़ी थी
लूट लेने का सबब था -मरने जीने की किसको पड़ी थी होश था बैखौफ सा वो आयी न फिर ऐसी रात थी अब याद करके होगा क्या चाँद तुमको दी मात थी..
*कुसुम सोगानी*

No comments:
Post a Comment