Saturday, October 19, 2019

कुसुम सोगनी 
हमें न चांद की परवाह थी
 ना चाँदनी की बात की - अमृत जो छलका होगा चखने की सौगात थी 
ऐ चाँद तुम इतराओ न तुमसे ज़्यादा ख़ूबसूरत मिलन की कायनात सी एक न बीते सी घड़ी थी
 लूट लेने का सबब था -मरने जीने की किसको पड़ी थी होश था बैखौफ सा वो आयी न फिर ऐसी रात थी अब याद करके होगा क्या चाँद तुमको दी मात थी..
*कुसुम सोगानी*

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