Monday, October 21, 2019

रोशनी

लक्ष्मी महारानी " पिताजी , मेरे दोस्तों के घर दिवाली पर चाइनीज बल्बों की लड़ियाँ और प्लास्टिक की कंदीलों से जगमगा रहे हैं ।
हमारा घर कब जगमाएगा ? " " हाँ , बेटे उमेश ! विदेशी चीज चाइनीज लड़ियों के बदले हम आज ही घर को स्वदेशी इको फ्रेंडली मिट्टी के दीपक और कंदील से रोशन करेंगे , क्योंकि मिट्टी के दीये कुम्हार की कमाई और जीवनयापन का साधन है ।उसे हम रोजगार देंगे ।
पर्यावरण संरक्षण करेंगे और हमारी सरकार ने देश को प्लास्टिक से मुक्त करना ।" " ठीक है पिताजी । यह कदम हमें खुद ही उठाना । जब हम बदलेंगे तभी समाज बदलेगा ।" " चलो हम परंपारिक रंग - बिरंगी पतंगी कागजों , बांस की खपंचियो से कंदील बनाते हैं ।
 यह हुनर मैंने तुम्हारे दादा जी से सीखा था और अब तुम .. । " बातों ही बातों में कितनी बड़ी सुंदर कंदील बना दी ।" " चलो , इसे हम बॉलकोनी में टाँग के दीपक जलाएँ ।
" अरे वाह पिताजी ! ,घोर काली अमा की रात दीपक , कंदीलों की रोशनी से महारानी लग रही है । ऐसा लग रहा है आसमान के तारे जमीन पर उतर आए हो । " " हाँ बेटे , दीपक अँधेरे को दूर भगाता है । इसलिए कहीं भी अँधेरा नहीं रहना चाहिए । लक्ष्मी भी उसी घर आती है ।
जहाँ स्वच्छता , प्रेम , मैत्री का उजास होता है । तुम्हारी बहन , दादी और माँ ने तो सारे दीपक जलाके सारा घर रोशन कर दिया ।
" डॉ . मंजु गुप्ता वाशी , नवी मुंबई ।

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