लघु कथा
( दौड़)
मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि जल्दी उठा करो, स्कूल हमेशा समय पर पहुँचना चाहिए। मैंने लगभग खींचते हुए अपनी छह साल की बेटी को उठाया ओर साथ ही उसे तैयार करते हुए, समय की पाबंदी पर बोले भी जा रही थी।
जब उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तुम सुन भी रही हो। उसने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए कहा,
"आप तो कहती थी कि बचपन के दिन बहुत सुहाने होते है,
पर मुझे तो लगता है कि बचपन स्कूल ओर कोचिंग के बीच भागने को कहते है। "
अपनी बात कहकर उसने अपना बैग लिया ओर स्कूल के लिए निकल गई ओर मैं बेबसी से उसकी तरफ देख रही थी,
ओर सोच रही थी कि सच में आज बच्चे अपना बचपन कहा जी पा रहे है, जहाँ देखो वहाँ एक दौड़ है, चाहे परीक्षा में अच्छे अंक लाने
की हो या टी. वी के किसी रियलटी शो में भाग लेने से लेकर उसे जीतने तक। आजकल बच्चों की ज़िन्दगी भी दौड़ जैसी हो गई है।
आदिति भदोरिया

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