आज का विषय
लघुकथा
शीर्षक
*दीपलक्षमी*
शगुन पर शगुन आ रहे थे। मिठाई के अम्बार लग गये।
क़जरदोजी जरी रेशम की साड़ी में समधन समाहित हो गई।
रिश्तेदारी में डंका बजा,बहू बहुत बड़े घर से आई है।
बहू के पिता की बहुत आन बान शान है।
हमारा बेटा कुछ ऐसा ही है जो पसंद करता है,वह नगीना ही होता है।
-- प्रशंसा के खूब कशीदे कढ़े गये।
आओ बहू आज पहला दीप तुम धरो,तुम घर की लक्षमी हो। इस घर की कुलवधु लक्षमी हो।
पूजन करने के लिए बैठने का रिवाज है,बहू कहां यह सब करती। हाथ में सुनहरी बटुआ झुलाते हुए बोली__
अम्माजी यह सब आपका काम है,आज तो दीपावली की रात है हमारे दोस्त प्रतिक्षा कर रहे हैं,आज तो सारी रात हम बाहर रहेंगे।
'दीपक की लौ सदा धीरे धीरे जलती रहती है।
बिजली अक्सर गुल हो जाया करती है'।
अम्मा को पता चल गया था कि ______
'चमक दमक की लक्षमी से लक्षमी प्रसन्न नहीं होगी'।
'मां लक्षमी को दीपक की मंद लौ ही भाती है"।और अम्मा ने सारे दीप प्रज्जवलित कर दिये।
प्रस्तुति__
🙏माया बदेका
१९--१०--२०१०

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