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| श्रीमती नीति अग्निहोत्री |
दीये की कम्पित लो
एक मौन संवाद कायम
कर बैठी हैं।
जब तक तेल है दिये में
में यू ही झिलमिलाती रहूगी
या फिर किसी तेज हवा का
शिकार भी हो सकती हूं।
मुझे प्रदीप्त करने वाले हाथो को
एक विश्वास था कि
में अन्धकार से लडूंगी
उस विश्वास को बनाये रखना
मेरे हाथों में नही था।
किन्तु गुलाब तुम्हारी नियति
तुम तो असमय ही डाली से टूट
पूजा की थाली में बैठे हो,अभी देवता के
मस्तक पर चढ़ इठलाओगे
सच बताओ कि तुमको कैसा लगता हैं।
गुलाब एक ठंडी सॉस भरकर बोला
बहन जो हाल तुम्हारा है ,वह मेरा भी है
मैं जी भरकर माली को देख नही पाया
अब इस क्षण को ही जी पूरा जी लेना चाहता हूँ, जब मेरी सार्थकता को अनुभव
करवाने वाले देवता के मस्तक पर चढ़ जाऊँगा...।
श्रीमती निति अग्निहोत्री
इंदौर

very nice ��
ReplyDeletevery nice👑👑
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