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| श्रीमती अचला गुप्ता |
मधुर कूक गूंजे कोयल की ,
मंद चले शीतल पुरवाई।
प्रेम का उत्सव साथ मे अपने
लेकर ऋतु वसंत है आई।
हरी भरी सी वसुंधरा है,
गीत मृदंग बजाते मन मे।
सुंदर पुष्प बिखेरें खुशबू ,
चहचहाते पंछी वन में।
धरा के हाथों में सृष्टि ने
मानो मेहंदी आज रचाई।
प्रेम का उत्सव साथ मे अपने ,
लेकर ऋतु वसंत है आई ।
श्रीमती अचला गुप्ता


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