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| सुषमा दुबे |
पीत पात झर गए , खिली कली नव आस की
नवल से गीत गा रही रश्मियां प्रभात की
भानु ने बिखेरे सप्त रंग आसमान से
धानी सी चुनर उडी पूर्व के उजास से
दिशा दिशा बिखर गई, लालिमा प्रभास की
पीत पात झर गए .................
फिज़ाओं मे बसंती रंग है बिखर निखर रहे
मान्द्लो की थाप पर कदम कदम थिरक रहे
पलाश की छटा कटा से अंग यू महक रहे,
गुलाबी रंग से सजी है क्यारियाँ गुलाब की
सुनहली चूनरी पहन धरा चटक मटक रही
डालियों पे आम्र की कोयले चहक रही
ऋतु बसंत सज सँवर फाग गुनगुना रही
रंग कासनी भरी डलियाँ कपास की
पीत पात झर गए ..................
बादलों के रथ उतर रहे हिमशिखर के गात से
श्वेत से कपोत झुंड झाँकते विहान से
मुकुन्द कंद झूमते हवाओं के स्पर्श से
बांसुरी बजी कहीं गोपियों के रास की
पीत पात झर गए .................
सुषमा दुबे


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