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| मनोरमा जोशी |
होली उत्सव प्रीत का ,
यह रंगों का बाजार ,
निशदिन फागुन प्रीत ,
के नये पढ़ाये पाठ ।
अखियों ही अखियों ,
हुऐं रंगों के संकेत ,
रह रह कर महके
रात भर कस्तूरी के खेत ।
प्रीत महावर की तरह ,
इसके न्यारे है रंग ,
बतियाती पायल हँसे ,
हँसे ऐड़ियाँ संग ।
रंगों वाले आईने ,
भूलें सभी गुमान ,
जो भीगें वो जानता ,
फागुन की मुस्कान ।
दोहे ठुमरी सखियां ,
फाग अभंग ख्याल ,
मोसम करता रतजगा ,
फागुन की चौपाल ।
मनोरमा जोशी

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