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आशा जाकड़ |
सखि कैसा आया रे बसंत ?
जीवन का होगया मानो अन्त।
पौधे खामोश से लग रहे,
निर्जीव मानो सो रहे हैं ।
पलाश ऐसे सुलग रहे,
मानो अंगारे दहक रहे ।
किस-किस का होवेगा अंत
सखि कैसा आया रे बसंत?
युद्ध की चल रही आंधियाँ,
मौत की सुना रही कहानियां ।
वीरों की बता रही जवानियां,
आन पर मर मिटी क्षत्राणियाँ।
गूंज बलिदान की दिक- दिगंत
सखि कैसा आया रे बसंत ?
वीरों ने पहना बसंती चोला ,
सिर पर बांधा कफन का सेहरा।
तोड़ा गांव - परिवार से नाता ,
रणभूमि से अब उनका नाता।
चहुँ ओर तूफानों का ना कोई अंत
सखि कैसा आया रे बसंत ?
रण में युद्ध - बाजे बज रहे,
शस्त्र ले सैनिक आगे बढ़ रहे ।
ऊपर बर्फीली आंधियां और,
सीने पर गोलियाँ सह रहें।
कर रहे दुश्मन से भिडन्त
सखि कैसा आया रे वसन्त?
आशा जाकड़


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