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| आराधना विसावाडिया |
आज बरबस ही मधुरा का अपने ससुर से आमना-सामना हो गया |वह हड़बडा़हट में अपने सिर के पल्लू को खींचनें ही वाली थी कि पीछे से धक्का आया |देखा तो सासूमां खडी़ थीं |मधुरा सर पर पल्लू लो, दिखता नही है पापाजी खडे़ं
हैं |जानबूझकर सामने आ जाती हो |मधुरा कुछ बोल न सकी |
हमारे जमाने में तो एक हाथ का घूँघट होता था |घूंघट और नीचे करो |घर में ससुर हैं, जेठ हैं, कुछ तो लाज रखो |ऊपर से गांव वाले कया कहेंगे कि इतनी पढीं-लिखी बहू का कया
करेंगे |जब घूंघट में लंबाई ही नहीं?
शहर की लड़की गांव में आते ही कुछ और ही बन चुकी थी
संस्कारों के बोझ तले जुबान न खोलने की गांठ जो मां ने बांध दी थी |
एक दिन सासूमॉ ने कहा-तुमने सिलाई सीखी है न मधुरा?
जी मम्मीजी उसने कहा |चलो एक ब्लाउज सिलकर बताओ ये कपड़ा रखा है | पहले काटो, फिर सिलो |तुम्हारे पापा तो कह रहे थे कि लड़की को सिलाई आती है |
एक लड़की की शादी के बाद पल-पल परिछा होती है |मीठे में कया बनाना आता है ?जी मुझे कुछ भी बनाना नहीं आता
घर में छोटी थी तो मौका ही नहीं पड़ा |मन में सोचा सास भी मां की तरह ही होती है ,तो सीख लूंगी पर… .
मेरे बेटे अनुपम के लिए तो बहुत रिश्ते आ रहे थे |लाखों का
दहेज भी मिलता |यहां तो लड़कियों की लाईन लगी थी |
मधुरा नीचे बैठो, दिखता नहीं मैं नीचे बैठकर पूजा कर रही हूं, और तुम सोफे पर बैठी हो |
यदि मैं आपकी बेटी होती तब भी आप यही कहतीं, नीचे बैठो, लंबा घूँघट डालो |वाह क्या मोल-भाव किया है, एक
पढ़ी -लिखी लड़की का आपने?
शर्म तो ऑखो की होना चाहिए, न कि घूंघट की ओट की |
बडो़ं की इज्जत घूंघट व सिर ढकनें से होती है तो क्या पुरूष
कभी किसी की इज्जत नहीं करते? ऐसा घूंघट मेरे किसी काम का नहीं |यह मुझे आगे बढ़ने से रोकता है| गुलामी की
जंजीर में बांधता है |
द्वारा -आराधना विसावाडिया
इंदौर

बहुत बढिया
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