Thursday, February 7, 2019

वसन्त ऋतुओं का राजा

 
मंजु गुप्ता
रवरी 10, 2019 वसन्त पंचमी का महापर्व है  संग विद्या , बुद्धि , वाणी की देवी सरस्वती माँ का पूजन और 1फरवरी को  हिंदी चेतना के सशक्त कवि सूर्यकान्त  त्रिपाठी निराला जी का जन्मोत्सव ।
बसंत को यदि में कामदेव का पर्याय कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । शिव के कोप से कामदेव भस्म होकर या प्रकृति में अंनग रूप बिखेरते हैं ।कहते भी हैं , " आई बसन्त की पाँचे , बूढी डुकरिया नाचे ।  "  बसन्त  की खूबसूरती तो लाजवाब , बेमिसाल है । कामदेव की जिस पर पर भी नजर पड़ जाए तो वे अपनी सुधबुद  खो देता है । कली भी उस पल खिलनेवाली है तो वह भी संयमित हो जाती है , तरकश से निकलनेवाला तीर भी बाहर नहीं निकल पाता । ये सारी प्राकृतिक गतिविधि उसके रूप में सम्मोहित हो जाती है । जो  संतुलन , अनुशासन , धैर्य का पैगाम देती हैं  , आशा , नवपल्लवित जीवन का भी  । मस्त मलय  की मंद , मंद शीतल महकती  , महकाती स्वास्थ्यवर्द्धक पवन चराचर में अपना जादू बिखेरती है । प्रकृति की गोद में खेतों में लहलहाती पीलें पुष्पों से पल्लवित नवयौवना  सरसों अपना आँचल पसार के वंसत में समाहित हो के कौमदी उत्सव   मनाती है ।  मुझे अपना बचपन याद आ गया ।  संसार का तीर्थ धाम हमारे नगर ऋषिकेश , उत्तराखण्ड में वंसत  पंचमी का मेला लगता था । अब  नहीं लगता शायद ।

 तब उस नगर के सारे निवासी हिन्दू , मुस्लिम  सिख , पंजाबी ,  पहाड़ी , गढ़वाली आदि  सारे अनेकता में एकता की मिसाल कायम कर बड़े उत्साह , जोश के साथ पीले परिधानों में साज , सँवर के  इस पर्व को हर्ष , उल्लास से मनाते थे ।महीनों पहले से नगर में उत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती थी । हिंडोले लग जाते थे । लघु भारत इस उत्सव में दिखाई देता था । गटाइलायचीवाला  रंगीन खांड से चिड़िया , बत्तख बनाके  छोटे , बड़ों को लुभाता था । पीपनी की पी , पी का मीठा शोर कर्णप्रिय लगता था ।  बच्चों के वाटर बम पर टप्पे मारते हाथ , रंग बिरंगी गुब्बारे फुलाते गाल , माता पिता के संग हाथ पकड़े रोते , हँसते छोटे बच्चे , बड़े,  युवा , स्त्री , पुरुष मनोरंजन के साथ प्रेम , सौहार्द्र , सद्भाव , सामाजिक समरसता की मिसाल थी । नस्ल , वर्ण , जातीयता , प्रांतीयता का भेदभाव की कोई लकीर न थी ।

आज का  शैशव दोस्तों के संग साथ इन चीजों से , आउट डोर मनोरंजन से दूर इनडोर ऑन लाइन खेलों में व्यस्त है । वे क्या जाने वसंत पंचमी महोत्सव । 64 कलाओं वाली विद्या की देवी सरस्वती माँ का पूजन । हर स्कूल , हर घर में सरस्वती पूजन किया जाता था । जिससे उसकी कृपा सभी जड़ चेतन पर बरसती रहे ।
    इस पावन दिन वहाँ के महंत जी के 'भरत मंदिर ' के माथे पर हीरे जड़ित भरत जी की मूर्ति को पालकी  में बिठाकर पतित पावनी गंगा जी परिक्रमा कराई जाती थी । वहां पर किवंदन्ति भी है कि राम रावण युद्ध में रावण को मार के जब राम , लक्ष्मण , भरत , शत्रुघ्न चारों  भाई राक्षस हत्या के पाप का प्रायश्चित करने के लिए ऋषिकेश की गंगा तट पर आए थे । शायद यह भी कारण हो सकता है भरत जी की गंगा परिक्रमा का महत्त्व ।
तब सारे नगरवासी इस पावन   पुण्य महोत्सव का बैचेनी से इंतजार करते थे । हर कोई इस अवसर का पुण्य लेने का लाभ उठाने  के लिए भरत जी की सवारी का दर्शन करता था और गुड़ की भेली ,रुपये , पीले मीठे चावल का भोग लगा  कर  भेंट चढ़ाते थे । हम सब भाई , बहन माँ , पिता के साथ  भीड़ भरे परिवेश में भरत जी का आशीर्वाद ,  दर्शनाभिलाषा को पूर्ण करते थे ।
 जनमानस  अपनी  मनोकामनाओं को पूर्ण करने की दरखास्त की अर्जी भी भरत जी से लगाते थे । कितनी आपाधापी में  श्रद्धालुओं की भीड़ होती थी ।
 आरती के थाल सजाए पंडे  , पुरोहित, भक्तगण गंगा जी की , भरत जी  की आरती कर , दीप दान , फूलों को  दोंनों में सजाकर गंगा  की धाराओं में प्रवाहित कर मनोरम दिव्य दृश्य का चित्रण बहुत मनहारी लगता है । सस्वर पाठ में गंगा आरती "   जय गंगा मैया स्वामी जी गंगा मैया " की जाती है 
     प्राकृतिक नजारों से सराबोर , शैक्षिक स्थली ज्ञान आध्यात्म से  समृद्ध बनी रहे । इसलिए  इसी दिन वहाँ के गंगा तट पर सरस्वती का भी पूजन होता है । जिसका प्रभाव साफ दृष्टिगोचर हुआ है ।  देश , विदेशो में डॉक्टर , इंजीनियर , वकील , प्रशासनिक सेवाओं में आई ए एस जैसे हमारे बड़े भाई स्व  विजय , नवनीत आदि   प्रबुध्द छात्रों ने ऋषिकेश का नाम रोशन किया है । वहीं के महंत शांतिप्रपन शर्मा जी उत्तरप्रदेश के मंत्री रहे । तब उत्तराखण्ड राज्य नहीं बना था । उत्तरप्रदेश था । मेरे संस्कारों की जन्मभूमि ऋषिकेश है । जिसका ऋण कभी नहीं चुका सकती ।
 हमारे पिताजी ऋषिकेश में  शैक्षिक क्रान्ति के जनक कहलाए जाते हैं ।  ज्ञान की देवी सरस्वती के वे उपासक थे । सरस्वती  की  कृपा से वे हिंदी , अंग्रेजी , उर्दू के भाषाविज्ञ थे , कुशल वक्ता , लेखन सृजन से गढ़ा व्यक्तित्व , कृतित्व था । उनकी कृपा  सभी विद्यार्थियों पर बरसी । ये इसलिए कलम चली कि आज की पीढ़ी इन पर्वो का गौरव को जाने और माने ।
 सरस्वती पूजन  का महत्त्व इसलिए  भी है कि  ज्ञान  , सुमति के बिन तो जीवन में अँधेरा  है । विद्या की देवी सरस्वती ज्ञान उजियारा करती है क्योंकि एक शिक्षित बाल , बालिका  बनेंगे। जो परिवार , समाज , देश , जगत का व्यवस्थित दीपक है।  यही बाल दीप बड़े होकर करेगा  दिवाली सा सर्जन का  प्रकाश । अगर कुमती अव्यवस्थित हो तो अंहकार , संकीर्णता अज्ञान का होगा सृजन ।जो होगी होलिका की आग- सी संहारक ।
 सरस्वती माँ के सम्मुख छोटे बच्चे प्रथम अक्षर ज्ञान का सीखते हैं । जिसका उदाहरण है हमारी बड़ी दीदी का सुपुत्र छोटू उर्फ़ सौरभ ।जिसको लेकर  मैं , माँ , पिताजी  यानी नाना , नानी के साथ हम ऋषिकेश के अपने घर के पिछवाड़े के कान्वेंट स्कूल में बसंत पंचमी के दिन उसका दाखिला कराया । वहीं उसकी शिक्षा की नींव गढ़ी थी । आज वह सफल , मेधावी होनहार कंम्प्यूटर इंजीनियर बंगलोर में है । 
हेमंत , शिशिर की सर्द सर्दी  बसन्त से डर से  गायब  जाती है ।कृष्ण ने भी इस  बसन्त की प्रशंसा की है -
   "मैं ऋतुओं में बसन्त हूँ ।  "
मंजु गुप्ता 
वाशी , नवी मुंबई

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