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| मनोरमा जोशी |
मेरे पिया गये परदेश ,
सखीरी मेरा मन तरसे ,
बसंती रंग बरसें ,
जिया मे कैसे रंग हरखे ।
सरसों बढ़ती अरहर बढ़ती ,
गढ़ती नही कहानी ,
राह ताकते हो गई उमर सयानी ,
टूट गये सब्र के फूल
मन पुलके तन हरसे ,
बसँती रंग बरसे ।
बौर फूलते गैदा हँसते ,
महुआँ भी यदमात ,
कोन जतन हो सखी हमारे ,
पिया मिलन हो जाये ,
दीप आंस के बुझे कहीं
कांप उठी इस डर से
ऐरी सखी न पिया हमारे
दहकन लगें पलाश ,
पगलाई धरा लगती है बोराया आकाश ,
चातक जैसी अकुलाहट हैं ,
बुझ पाये अमृत बसंत से
अमृत बरसें बसंती रंग बरसें ।
मनोरमा जोशी


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