Thursday, February 7, 2019

बसंत

 
वंदना पुणतांबेकर
ठंडी-ठंडी पुरवाई कुछ इस तरह दिल को छू गई।
हर तरफ हरियाली,बसंत बहार का आलम। 

दिलो के जज्बात को दिलो से मिलने का आलम।
मद-मस्त पवन की मदहोशी में प्रकृति इस कदर खो गई।

परिंदों की चहचहाट, सांझ की बेला,खुला आसमां।
कुछ इस तरह चहुँ ओर फैला बसन्त का आलम।

ये रुत,ये बहार, ये बसन्त सब मन को मोह गई।
पावन धरा पर वासन्ती फूलो का   मेला।


हर तरफ पीले,पीले सरसो के फूलों का बसेरा।
थड़ी गुलाबी बयार, फूलो से सजी डलिया कुछ इस कदर खिल गई।

मन मतवाला हो सजनी के इंतजार में।
गुनगुनाते भंवरो के राग पर झूमती कलियाँ इंतजार में।

                                                            तितलियां पराग रस पीकर अपने गूँजन मे खो गई।
                                                            पीहू राग कोयल को बोली
                                                            मन यू कहे दिल की बोली,
                                                            सप्त रंग के सपनों में प्रकृति इन्द्रधनुषी रंगों में खो गई।

ठंडी-ठंडी पुरवाई कुछ इस तरह दिल को छू गई।

वंदना पुणतांबेकर
                         

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