Thursday, February 21, 2019

वंदना अर्गल
जागृति
नारी की असमिता पर आज
पडा़ खतरा है,
आदमी को देखो आज
फिर हैवानियत पर उतरा है,
मानवीय संवेदना शूनय हुई,
दुषप़वतियो और दुशचरित की सघन घटाऐ छाई हैं,
मानवता आज फिर
सहमी और  सकुचाई है।
नारी को तुम दुबँल ना समझो
नारी अब न अबला है,
अब अब उसने भी जला ली
विदोह की पृबल जवाला है,
नारी की असमिता पर आज.....
बहुत हो चुका अब न सहेगी जुलमो को ,
एक न ई   क्राति लायेगी,
आतमबल और आतमविशवास से
भर नारीएक न ई जागृति लायेगी।
मूर्रछित हुई। वसुंधरा पर
मानवता फिरसे जगायेगी,
खोयी हुई गरिमा को पुनः वह बढा़येगी।
नारी की असमिता़.......

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