Wednesday, February 20, 2019

सबल नारी


वंदना पुणेताम्रकर
( बलात्कार के बाद टूटी बालिकाओ के लिए एक सकारात्मक कविता)           


तुम एक सबल नारी हो,अबला
नही।
तुमकर सकती हो।
तुम हर परिस्थिति से लड़ सकती हो।
तुम एक बहूँ बनकर किसी परिवार को सँवार सकती हो।
 तुम सबल बन सकती हो।
जिस घर की बेटी तुम।
तुमसे घर महकता।
फिर से तुम महका सकती हो।
नारी जीवन संघर्ष भरा।
जीवन के इस ताने,बाने को।
 तुम बुन सकती हो।
वीरांगनाएं हुई अनेक।
तुमको भी कुछ करना होगा।
आँचल की छीनी हुई लाज को। तुमको हीअब ढ़कना होगा।
तुम ढक सकती हो।
तुम फिर खड़ी हो सकती हो।
ये वक्त नही सिसकियों में घुटने का।
ये वक्त हैं,सशक्त सबल बनने का। तुम बन सकती हो।
धैर्य की मिसाल तुम।
अब भी अधिकारों से लड़ सकती हो।
छल,धोखा,अविश्वास से छली गई हो।
उठो अब भी इन बाजीगरों की बाजी पलट सकती हो।
चेतन चंचल मन तेरा।
दर्द भरा यह तन तेरा।
हर चेहरे पर मुस्कुराहट।
तुम भर सकती हो।
पुरुष प्रधान समाज मे,तुम छली गई एक नारी हो।
जब जिसने जैसा देखा,तुम उस जाल में फसी फुलवारी हो।
तुम फिर खिल सकती हो।
दाग लगे इस दामन कोअब धोना होगा।
उठो अब नई दिशा में तुमको चलना होगा।
तुम चल सकती हो।
बुझी चिंगारी भी आग रखती।उठो अब नई रोशनी से इस जीवन को रोशन करना होगा।
तुम जीवन मे रोशनी भर सकती हो।
 तुम कर सकती हो।
         वन्दना पुणतांबेकर
                इंदौर

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