Wednesday, February 20, 2019

आटे का दीया

सुश्री स्वाति सिंह
आज तो मैं.. आज मैं... बस अब नहीं | विशाल बहुत ज्यादा परेशान था आखिर उसे रहा नहीं गया और एक दिन उसने छत पर चढ़कर आवाज सुनने की कोशिश की| यह जानने की कि आखिर उन लोगों को गरिमा से क्या परेशानी है| उसने दरवाजे से कई बार झाँकने की कोशिश भी की पर उसे ठीक तरह से कुछ समझ में नहीं आया| हाँ पर यह पक्का था कि यह गरिमा की ही रोने की आवाज़ थी| अब तो उस तरफ से आने वाली हर आवाज़ जैसे उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थी | एक दिन जब सुबह से कोई आवाज़ नहीं आयी तो विशाल और भी ज्यादा बैचैन हो गया| तभी उसका ध्यान बाहर सड़क पर गया| गरिमा मंदिर जा रही थी वह शेविंग आधी छोड़कर बाहर सड़क पर आ गया और गरिमा के पीछे पीछे चलने लगा और मौका पाते ही बोला 'क्यों इतना सहन कर रही हो?' 'छोड़ क्यों नहीं देतीं?' 'मैं तुम्हारा साथ दूंगा|' गरिमा बोली 'मैं हाँथ जोड़ती हूँ तुम चले जाओ यहाँ से |' वह बोला एक बार सोच  ...  गरिमा रुंधे हुए गले से बीच में ही बोली - 'घर के अंदर तो कम से कम ज़िंदगी चलती रहेगी | तुम्हें पता है एक औरत की ज़िंदगी आटे के दिए की तरह होती है | अगर ठिकाने नहीं लग पायी तो घर के अंदर उसे चूहे कुतर कर खा लेते हैं और बाहर उसे कौवे नोंच लेते हैं...

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