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| कुसुम सोगानी |
जब पीली सरसों फूले
टेसू महुआ सी महके
आम्र कुंज में भँवरे गूंजे
पीक पर्ण धरती पर बिखरे
तो सखि जानो यही बसंत
डाल डाल कोयलिया कूके
वृक्ष आम्र कोंपल बौराये
धरा पीत से प्रीत दिखाये
बादल कोहरा छंटते जाये
तो सखि जानो यही बसंत
प्राण प्रिये की याद सताये
शीत ऋतु शिथिला सी जाये
श्वेत प्रभा सम राग रागिनी
तो सखि जानो यही बसंत
साहित्य सभाएं सजती जायें
सरस्वति वंदन पूजा रचायें
सूरज पीला सा हो जाये
पवन चाल पागल हो जाये
महक महक अंतर्मन जाये
तो सखि जानो यही बसंत
कुसुम सोगानी


इस रचना को पढ़कर मन बसंती हो गया
ReplyDeleteBahut shaandaar Kavita
ReplyDeleteवाह , अदभुत कल्पना शीलता के साथ वसन्त आगमन का विवेचन,
ReplyDeleteVery Nice Poem Great Poetry
ReplyDeleteShabdo ka sahi taalmel...
ReplyDeleteGood combination of words...
Good welcome of basant Hritu...
Shibbu
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