Thursday, August 1, 2019

उजली सोच का उजाला

[17/06, 6:36 AM

Add captioसम्रति श्रीवास्तव
रीना के चेहरे पर सूरज की नर्म-नर्म धूप के पडते ही उसकी आॉखों में हलचल हुई तो पास बैठी मां के चेहरे पर खुशी की लहर दौड गई।
मां के प्यार से रीना को पुकार ने पर रीना थोडा कुनमुनाई और कंठ से धीमी सी आवाज आई हूं!
 ने प्यार से रीना के सर पर हांथ फेरा तो रीना ने आंख खोलदी।
    पर मां की नजरों में उठते सबालों से सहम कर नजरें दूसरी तरफ घुमालीं।
तभी हांथ में दबा लिए भाई अंदर आया "कैसी तबियत है दी"
   रीना बस होले से मस्कुरादी।
  "मम्मी आप घर चलो दिदी के पास रुकने के लिए जिजाजी आरहे हैं " भाई ने बोला
मां ने रीना की तरफ  देखा जैसे जाने की आज्ञा मांग रही हो और रीना ने भी आॉखों से ही जाने की इजाजत देदी।
और खुद आंख बंद करके लेट गई।
दरबाजे की आहट से उसकी आंख खुली तो देखा 20 -21 साल की लडकी अंदर आई (अनपढ मगर एक दम चुलबुली और ताजगी से भरी हुई, ) अंदर आकर जोश के साथ बोली
"गुड मोर्निंग दीदी, कैसी हो। मेरा नाम शिक्षा है, और में यहाँ सफाई करने आई हूं"
रीना ने एक नजर उस पर डाली और फिर आंख बंद करली। सिक्षा ने काम तो शुरू किया पर उसकी जुबान हांथ से ज्यादा तेज चल रही थी।
 बिना किसी भूमिका के उसने बोलना शुरु किया "दीदी  इतने बडे अस्पताल मैं आप का इलाज चल रहा है तो आप गरीब तो हो नहीं, तो क्या
साहब ने दूसरी औरत रखली"
रीना को कुछ समझ नहीं आया तो उसने सबालिया नजरों से सिक्षा कि तरफ देखा!
" नहीं वो आप ने आत्म हत्या करने की कोशिश की है न इसलिये पूछा"
रीना ने ना में गर्दन हिलाई और आंख बंद करलीं
लेकिन सिक्षा ने दूसरा सबाल दागा "तो आप के सास ससुर और पती मारते पीटते होंगे "
रीना परेशान हो गई और खीज कर न में सिर हिलाया। उसकी खीज का शिक्षा पर कोई असर नहीं पडा उसने फिर  पूछा तो क्या आप "बांझ हो?"
सुनते ही रीना के तन बदन में आग लग गयी मन किया सिक्षा का मुहं नोचले पर उसका कमजोर शरीर कोई भी हरकत करने को तैयार नहीं था सो सिर्फ दांत पीसकर रहगई।
रीना कि मिस-मिसाहट से अंजान शिक्षा ने एक सवाल और उछालदिया "तो क्या कोई आप को ब्लैक मेल करता है?"
 अब रीना से रहा नहीं गया गुस्से में बोली "क्या बकबास है। कुछ भी बके जारही हो। तमीज नहीं है बात करने की"
अरे दीदी नाराज मत हो मैं तो बस........."
2 मिनट चुप रहकर फिर शुरू हो गई" पर दीदी जब आप के पास दुख का कोई कारण ही नहीं तो आत्म हत्या क्यों ?
इस सबाल ने रीना को झकझोरा" अरे मैंने तो ऐसा सोचा ही नहीं, मैंने ऐसा किया क्यूं, ये अनपढ सच कह रही है" रीना ने मन में सोचा
उधर शिक्षा बोले जा रही थी "दीदी आप अमीर लोग भरपूर सुख सुविधा में रहने बाले छोटी छोटी बातों पर जान देते हो और हम गरीब अपनी सारी जिंदगी तंगी और बदहाली में सिर्फ इस उम्मीद में गुजार देते हैं कि आगे सब अच्छा होने बाला है।"
रीना ने अपनी  सफाई में कुछ कहना चाहा  " वो झगडा........
मगर शिक्षा तो बस अपनी ही धुन मैं बोले जा रही थी।
"दीदी हम दिन भर काम कर थक कर घर जाते हैं और वहां हमारा नाकारा पति दारु पी कर हमें मारता है तव भी हमारे मन मैं एस घिनोना बिचार नहीं आता "
हम गंदगी में रहते जरुर है दीदी पर हमारी सोच एक दम साफ  है, किंतू आप बडे लोग एशो आराम में रहने के बाद भी नकारात्मक सोच रख ते हो" "आप को भगवान ने सब कुछ दिया है जिसे आप गुस्सा, अभिमान और जिद मैं गवा देना चाह ती हो " खैर छोडो दीदी मेरा काम होग या चलती हूं अपना ध्यान रखना, और हां उजली सोच ही जीवन उजाला लाती है। कहकर सिंक्षा कमरे से बाहर निकल गई।
  आज एक अनपढ लड़की एक पढी लिखी को जिंदगी की शिक्षा दे गई।
[17/06, 6:43 AM]

रीना के चेहरे पर सूरज की नर्म-नर्म धूप के पडते ही उसकी आॉखों में हलचल हुई तो पास बैठी मां के चेहरे पर खुशी की लहर दौड गई।
मां के प्यार से रीना को पुकार ने पर रीना थोडा कुनमुनाई और कंठ से धीमी सी आवाज आई हूं!
मॉ ने प्यार से रीना के सर पर हांथ फेरा तो रीना ने आंख खोलदी।
    पर मां की नजरों में उठते सबालों से सहम कर नजरें दूसरी तरफ घुमालीं।
तभी हांथ में दबा लिए भाई अंदर आया "कैसी तबियत है दी"
   रीना बस होले से मस्कुरादी।
  "मम्मी आप घर चलो दिदी के पास रुकने के लिए जिजाजी आरहे हैं " भाई ने बोला
मां ने रीना की तरफ  देखा जैसे जाने की आज्ञा मांग रही हो और रीना ने भी आॉखों से ही जाने की इजाजत देदी।
और खुद आंख बंद करके लेट गई।
दरबाजे की आहट से उसकी आंख खुली तो देखा 20 -21 साल की लडकी अंदर आई (अनपढ मगर एक दम चुलबुली और ताजगी से भरी हुई, ) अंदर आकर जोश के साथ बोली
"गुड मोर्निंग दीदी, कैसी हो। मेरा नाम शिक्षा है, और में यहाँ सफाई करने आई हूं"
रीना ने एक नजर उस पर डाली और फिर आंख बंद करली। सिक्षा ने काम तो शुरू किया पर उसकी जुबान हांथ से ज्यादा तेज चल रही थी।
 बिना किसी भूमिका के उसने बोलना शुरु किया "दीदी  इतने बडे अस्पताल मैं आप का इलाज चल रहा है तो आप गरीब तो हो नहीं, तो क्या
साहब ने दूसरी औरत रखली"
रीना को कुछ समझ नहीं आया तो उसने सबालिया नजरों से सिक्षा कि तरफ देखा!
" नहीं वो आप ने आत्म हत्या करने की कोशिश की है न इसलिये पूछा"
रीना ने ना में गर्दन हिलाई और आंख बंद करलीं
लेकिन सिक्षा ने दूसरा सबाल दागा "तो आप के सास ससुर और पती मारते पीटते होंगे "
रीना परेशान हो गई और खीज कर न में सिर हिलाया। उसकी खीज का शिक्षा पर कोई असर नहीं पडा उसने फिर  पूछा तो क्या आप "बांझ हो?"
सुनते ही रीना के तन बदन में आग लग गयी मन किया सिक्षा का मुहं नोचले पर उसका कमजोर शरीर कोई भी हरकत करने को तैयार नहीं था सो सिर्फ दांत पीसकर रहगई।
रीना कि मिस-मिसाहट से अंजान शिक्षा ने एक सवाल और उछालदिया "तो क्या कोई आप को ब्लैक मेल करता है?"
 अब रीना से रहा नहीं गया गुस्से में बोली "क्या बकबास है। कुछ भी बके जारही हो। तमीज नहीं है बात करने की"
अरे दीदी नाराज मत हो मैं तो बस........."
2 मिनट चुप रहकर फिर शुरू हो गई" पर दीदी जब आप के पास दुख का कोई कारण ही नहीं तो आत्म हत्या क्यों ?
इस सबाल ने रीना को झकझोरा" अरे मैंने तो ऐसा सोचा ही नहीं, मैंने ऐसा किया क्यूं, ये अनपढ सच कह रही है" रीना ने मन में सोचा
उधर शिक्षा बोले जा रही थी "दीदी आप अमीर लोग भरपूर सुख सुविधा में रहने बाले छोटी छोटी बातों पर जान देते हो और हम गरीब अपनी सारी जिंदगी तंगी और बदहाली में सिर्फ इस उम्मीद में गुजार देते हैं कि आगे सब अच्छा होने बाला है।"
रीना ने अपनी  सफाई में कुछ कहना चाहा  " वो झगडा........
मगर शिक्षा तो बस अपनी ही धुन मैं बोले जा रही थी।
"दीदी हम दिन भर काम कर थक कर घर जाते हैं और वहां हमारा नाकारा पति दारु पी कर हमें मारता है तव भी हमारे मन मैं एस घिनोना बिचार नहीं आता "
हम गंदगी में रहते जरुर है दीदी पर हमारी सोच एक दम साफ  है, किंतू आप बडे लोग एशो आराम में रहने के बाद भी नकारात्मक सोच रख ते हो" "आप को भगवान ने सब कुछ दिया है जिसे आप गुस्सा, अभिमान और जिद मैं गवा देना चाह ती हो " खैर छोडो दीदी मेरा काम होग या चलती हूं अपना ध्यान रखना, और हां दीदी उजली सोच ही जीवन उजाला लाती है। कहकर सिक्षा कमरे से बाहर निकल गई।
  आज एक अनपढ लड़की एक पढी लिखी को जिंदगी की शिक्षा दे गई।

No comments:

Post a Comment

Featured Post

हिंदी पखवाड़े पर इंदौर संघ लेखिकाओ के पसंदीदा पुस्तकों पर विचार

एक सच्चा रिश्ता एक अच्छी किताब की तराहा होता है,  कितनी भी पुरानी हो जाए, फिर भी शब्द नहीं बदलते, रास्ते बहुत मिलेंगे भटकाने के लिए, लेकिन स...