Sunday, August 18, 2019

कल्पना जी की रचनाये


कल्पना ओसवाल

(गांव की ओर)

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एक छोटा सा गाँव है।जहाँ आज से ३५ वर्ष पुर्व गाँव के बीच मे एक बड़ा सा वृक्ष था जिसके चारों और चबूतरा बना हुआ था । जहाँ गाँव के सभी लोग बैठकर बातें करते और बच्चे खेलते थे।चारो और खुशी का माहौल था।इस छोटे से गाँव की सुनहरी यादे समय गुजरने के साथ भी बनी रही और लगभग २५ वर्ष बाद जब उस गाँव में गए तो देखा गाँव में सड़क, नल, और बिजली आ चुकी थी।गाँव का विकास हुआ था लेकिन गाँव के बीचों बीच बना चबूतरा टूटा हुआ था।वृक्ष पूरी तरह सूखा हुआ था।गाँव के बीच ऐसी हालत देख गाँव के बारे में सोचने को मजबूर हो गए।मकान कुछ पक्के थे लेकिन कच्चे मकानों की हालात पहले से खराब थी।सामने का छोटा सा मंदिर में सब कुछ वैसा ही था।मंदिर का कलर उतर रहा था,दरवाजे टूटे हुए थे।सामने के घर में एक छोटा सा स्कूल चल रहा था।यह सब देख कर महसूस हुआ क्या कर सकते हैं हम इस गाँव के आंतरिक विकास के लिए, अगर यह एक गाँव की कहानी है तो दूसरे गाँव के लिये भी हमे सोचना होगा।जैसे स्मार्ट सिटी बन रही है वैसे स्मार्ट गाँव कैसे बनेंगे।अपने गाँवो के विकास के लिए सबको मिलकर प्रयास करने होंगे।जैसे हमारे देश में स्वच्छता, हरियाली के मुद्दे पर कार्य हो रहा है,उसी तरह हमें गाँवो के विकास के लिए कार्य करना होगा।शहर -शहर लोगो को अपने अपने स्तर पर कार्य करना होगा ,तब हम अपने देश का विकास मिलकर कर पाएंगे और एक नये हिंदुस्तान की तस्वीर बनाएंगे।
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 परिचय-कल्पना ओसवाल
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एम.ऐ. ड्रॉइंग एंड पेंटिंग में किया है।1990 से चित्रकला ओर पेंटिंग का कार्य करती हूं और सिखाती आई हूं।लिखना मेरा बचपन का शौक है,समय -समय पर अपनी कविता लिखती आ रही हु।
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(इंदौर की नारी शक्ति)
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जागने के साथ,अब दौड़ रही है
इंदौर शहर की हरियाली को
चारो दिशाओ मे विस्तृत कर रही  है
हरे रास्तो की हरी हरियाली
आसमानों को चूम रही है,
इंदौर की नारी शक्ति
जागने के साथ, अब दौड़ रही है
हर और बढ़ती  निगाहें, हरियाली के दर्शन करा रही है,
अब शहर हरीयाली मे झण्डे गाड़ रहा है,
वक्त आ गया है जब देश का हर नागरिक जाग रहा है,
चारो और हरीयाली की दौड़,
मैराथन के समान आगे बढ़ रही है,
इंदौर की नारी शक्ति,जागने के साथ अब दौड़ रही है,
हम साथ-साथ है,यह हर नारी की आवाज है,
हम सब मिलकर हर रास्तो की,मंजिलों में अपने सपनों को
संजोए,
हाथ से हाथ मिलाकर, एक नए हिंदुस्तान का निर्माण करे,
इंदौर की नारी शक्ति, जागने के साथ, अब दौड़ रही है।
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(बारिश की फुहार)
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 बारिश कि फुहार बचपन की सैर करा लाई,
जब जब बारिश आई दौड़ कर छत पर आई,
ये देख सखियाँ साथ आई आज पहली बारिश याद आई,
मिलकर सबका प्रसन्न होना, एक दूसरे का ओले देख कर भागने और उन्हे एकत्रित करना याद आता है।
यह सब देख,
बारिश की फुहार बचपन की सैर करा लाई।
आज बहु इमारत में आये तो जमीन के घर याद आये,
पानी में कश्ती हमारी भी चलती थी,
बचपन में एक चिड़िया का बहना
पानी से उसे बचाना, कपकपाते उसके पंखो को सुखाना, स्कूल देर से पहुँचना,
यह सब देख
बारिश की फुहार बचपन की सैर करा लाई।
समय की धारा बहती चली गई,
कलम कब थम गई ,सालो बीत गए
आज मौसम ने ज गया है, एक बचपन को फिर लौटाया है,
यह सब देख
बारिश की फुहार बचपन की सैर करा लाई।

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