दिनांक 1।08।19
वार गुरुवार
एक समय था हम जब उठ
दौड़ दौड़ कर सब कुछ कर लेते,
भागते दौड़ते उधम मचाते
कूदा फांदी खूब मचाते
जीवन की हर दौड़ धूप में
आगे आगे कदम बढ़ाते।
थकना थकान क्या होती है
ये हमको तो पता नही था।
ये करना है वो करना है
आगे बढ़कर अब चलना है
कोई भी जब काम बताता
सब का उत्साह यूँ ही बढ़ जाता
भागते दौड़ते काम हम करते
कभी हम आराम न करते
गली गली में गिल्ली डंडा
छुपन छाई , कंचा कंचे
कभी सायकिल रेस भी करते
कभी ना थकते हँसते रहतें
घर मे जो बनता वो हम खाते
रोटी सब्जी दाल भात और
चटनी पापड़ सब मिलजुलकर
खाते थे,कभी कभी जो बनता
खीर पूड़ी और हलवा वो
भी सबके मन को भाता।
त्योहारों पर सारा परिवार
मिलकर करता काम हजार
ना कोई किसी से लड़ता
ना ही कोई शिकायत करता
प्यार भरा रिश्ता होता था
मिलजुल कर सब ऐसे रहते
बड़ो का कहना सब है माने
घर एक सूत्र में बंधा हुआ था
प्यार के सांचे में ढला हुआ था।
आज जमाना बदल भाई
कोई किसी की बात ना मानें
थोड़ा काम करे थक जाए
पिज्ज़ा बर्गर मैगी खाये।
छोटे परिवार सबको प्यारा
कोई बने ना किसी का सहारा
रिश्ते नाते थोड़ी देर के
फिर अपनी अपनी राह है पकड़े।
सायकिल की करे न सवारी
कार एक्टिवा बाइक प्यारी
गुल्ली डंडा अब पता नही
मोबाइल पर खेले खेल
पुराने दिन थे बड़े ही प्यारे
अब वो दिन ना आने वाले
मंगला श्रीवास्तव
इंदौर
स्वरचित मौलिक रचना
वार गुरुवार
एक समय था हम जब उठ
दौड़ दौड़ कर सब कुछ कर लेते,
भागते दौड़ते उधम मचाते
कूदा फांदी खूब मचाते
जीवन की हर दौड़ धूप में
आगे आगे कदम बढ़ाते।
थकना थकान क्या होती है
ये हमको तो पता नही था।
ये करना है वो करना है
आगे बढ़कर अब चलना है
कोई भी जब काम बताता
सब का उत्साह यूँ ही बढ़ जाता
भागते दौड़ते काम हम करते
कभी हम आराम न करते
गली गली में गिल्ली डंडा
छुपन छाई , कंचा कंचे
कभी सायकिल रेस भी करते
कभी ना थकते हँसते रहतें
घर मे जो बनता वो हम खाते
रोटी सब्जी दाल भात और
चटनी पापड़ सब मिलजुलकर
खाते थे,कभी कभी जो बनता
खीर पूड़ी और हलवा वो
भी सबके मन को भाता।
त्योहारों पर सारा परिवार
मिलकर करता काम हजार
ना कोई किसी से लड़ता
ना ही कोई शिकायत करता
प्यार भरा रिश्ता होता था
मिलजुल कर सब ऐसे रहते
बड़ो का कहना सब है माने
घर एक सूत्र में बंधा हुआ था
प्यार के सांचे में ढला हुआ था।
आज जमाना बदल भाई
कोई किसी की बात ना मानें
थोड़ा काम करे थक जाए
पिज्ज़ा बर्गर मैगी खाये।
छोटे परिवार सबको प्यारा
कोई बने ना किसी का सहारा
रिश्ते नाते थोड़ी देर के
फिर अपनी अपनी राह है पकड़े।
सायकिल की करे न सवारी
कार एक्टिवा बाइक प्यारी
गुल्ली डंडा अब पता नही
मोबाइल पर खेले खेल
पुराने दिन थे बड़े ही प्यारे
अब वो दिन ना आने वाले
मंगला श्रीवास्तव
इंदौर
स्वरचित मौलिक रचना

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