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"में रहू या न रहूं
भारत ये रहना चाहिए"
सौजन्य--(लेखिका संघ इंदौर ,म. प्र.)
आज पुस्तक की प्रथम रचना "अपना झंडा मुझे चाँद पर चाहिए"
लेखिका श्रीमती मंजुला भूतड़ा जी की बात करते हैं ल
"जो भरा नही है भावो से ,बहती जिसमे रसधार नही
वह ह्रदय नही वह पत्थर है ,जिसमे स्वदेश का प्यार नही'
उक्त पँक्तियो को अपनी लेखन से लेखिकाओं ने देशप्रेम की भावनाओ का इजहार किया है और सही अर्थों में देशप्रेमी होने का प्रमाण दिया है जी इस पुस्तक से सहज ही महसूस हो जाता है। यह लेखनी की जादूगरी है जहाँ मंजुला भूतड़ा जी चाँद पर देश का झंडा फहराते हुये कल्पना करती है जो साबित करता है कि हम निरन्तर साइंस के क्षेत्र में अग्रसर हो कर विकास की दौड़ में विश्व मे कुछ नया रच डाले जो सकरात्मक हो ,दादी ,नानी से सुनी कविता ,कहानी आज उस नन्ही सी बच्ची बड़ी होकर केवल स्वप्न नही बुन रही बल्कि वास्तविकता में आसमा के चाँद की सच्चाई को यथार्थता में देखना चाह्ती है उसे इस प्रयास से क्या मिलना है मिलेगा तो देश को बहुत बडीया कलम चली हैं मंजुला जी की जो प्रगति की सूचक है।बड़ी प्यारी बात कही है --"न रहे तो अम्न की अमानत छोड़ जाएगे, जिंदा रहे तो वतन की इबादत पर मुस्कुराएगे .." मन की कितब पन्नो पर लगता हैं लेखिका मुस्कुरा रही है औऱ इंगित कर रही है कि वो अक्षरों में सिमट कर नही वरन कलम की स्याही से चिंगारी प्रस्फुटित करने का संकल्प ले चुकी है ।
एक और पंक्तिया मन की गिरह खोलती हैं --
अनेक झंडों पर *चाँद देखा है मेने
अपना झंडा मुझे चाँद पर चाहिए....
गागर में सागर तो है ही पर देशप्रेम की वह भावना चाँद बना लो तुम भले ही झंडे पर मुझे क्या मतलब ,मुझे तो अपने वतन को चाँद पर देखना है ,बेहद उत्कर्ष भावना ।
सारांश में यही कहना होगा कि लेखिका प्रगतिवादी विचारों से ओतप्रोत है जो देश को धरातल पर ही नही बल्कि आसमा में चंद तारो के साथ देखने का ताना-बाना बना रही है जो काल्पनिक नही वरन आज के युग मे संभव है ।
भाजो एक ललक पैदा करती हैं ,लेखिका अपने इस प्रयास में सफल होती नजर आती हैषा सहज ,सरल और मन को छूती हुई एक आशा जगाती है

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