🙏
मंथन
अगाध श्रद्धा और विश्वास
भक्ति की पराकाष्ठा
निराहार उपवास व्रत
सूखती काया
अमृत्व की तलाश
भटकता रहता मन
किस क्षण की प्रतिक्षा
काया का विकार निकले
मन का विकार निकले
मनुज ,देवत्व की सभा में खड़ा होना चाहता है!
छल ,प्रपंच ,कपट ,ईर्ष्या,द्वेष कतार बद्ध खड़े हुए
निकल कितना निकलेगा बाहर
लाल मखमली जाजम
मनसद पर टिके आध्यात्म
अमावस का निर्माण ईश्वर ने किया
प्रकृति उससे चलती है!
पूर्णिमा को पकड़ने चला है
नहीं आती हाथ कभी
घोर कलयुग है,कष्ट केवल इतना कर
मन को पापों से मुक्त कर!
🙏माया मालवेन्द्र बदेका
१८__८__२०१९
मंथन
अगाध श्रद्धा और विश्वास
भक्ति की पराकाष्ठा
निराहार उपवास व्रत
सूखती काया
अमृत्व की तलाश
भटकता रहता मन
किस क्षण की प्रतिक्षा
काया का विकार निकले
मन का विकार निकले
मनुज ,देवत्व की सभा में खड़ा होना चाहता है!
छल ,प्रपंच ,कपट ,ईर्ष्या,द्वेष कतार बद्ध खड़े हुए
निकल कितना निकलेगा बाहर
लाल मखमली जाजम
मनसद पर टिके आध्यात्म
अमावस का निर्माण ईश्वर ने किया
प्रकृति उससे चलती है!
पूर्णिमा को पकड़ने चला है
नहीं आती हाथ कभी
घोर कलयुग है,कष्ट केवल इतना कर
मन को पापों से मुक्त कर!
🙏माया मालवेन्द्र बदेका
१८__८__२०१९

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