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| नम्रता सरन सोना |
रस्सी पर चलती जाती
नटनी,,
संभल संभल कर
कदम कदम बढाती
नटनी,,
रस्सी के बीचों बीच
एक पैर पर
झूल झूल जाती
नटनी,,
देखने वालों की
साँसें रुक जाती,
पर,
ढम ढम की आवाज़ पर
हैरत अंगेज़ करतब दिखाती
नटनी,,
तमाशबीन चवन्नी अठन्नी
उछालकर अपनी राह पकड़ते ,
एक एक सिक्का जमा करके
पल्लू में गाँठ लगाती
नटनी,,
थके कदमों से घर को
सौदा लेकर जाती
नटनी,,
मौत को मात दे आई हो
ऐसा जश्न मनाती
नटनी,,
अगली सुबह फिर उठती
नटनी,,
ठुड्डी पर तिल लगाती
नटनी,,
जीने के खातिर फिर
मौत को गले लगाती
नटनी,,
ढोलक की इक थाप पर
रस्सी पर चढ़ जाती
नटनी,,,,,,,
*नम्रता सरन "सोना"*

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