Saturday, April 20, 2019

इतवारी कविता


ज्योति देशम
उत्पल बैनर्जी की कविता - दुर्दिनों में
वाचन स्वरुप - ज्योति देशम
प्रदर्शन - बुरा पैट
विडिओ एडिटिंग - कृष्णपाल

https://youtu.be/JaBUU2sBl0w

"ये जो दोपहर है न रात में देखने को ये दिन में कोई निकलता नहीं।"
"तो तुम रोज़ निकल जाओगे न?"
"हाँ, लेकिन बीच में अमावस आ जाता है।"
"अब ये अमावस कहाँ से बीच में आ गया? हमें तो वीडियो पूर्णिमा पर बनाना है।"
"हाँ वो तो है, लेकिन कहाँ?"
"एक काम करते हैं शीलनाथ बाबा की धूनी पर चलते हैं, इसके पीछे एक खँड़ नुमा जगह भी होती है।"
"हम्म्म्म ठीक है।"

कामों में उलझे रहे हम, पूर्णिमा कब आई कब निकल गई पता ही नहीं गया। 
"अरे यार! आज पूर्णिमा है और हमे ध्यान ही नहीं है।"
"क्यों पूर्णिमा को क्या करना है?"
"फिर भूल गए? वीडियो बनाना है।"
"अरे हाँ! मेरा तो ध्यान से ही उतर गया। इसी तरह अभी भी तीन-चार दिन तो दोपहर लगभग पूरी हो चुकी है, कल आखिरी हैं।"
"कल नहीं हो पायेगा मुझे एक बर्थडे पार्टी में जाना है?
"जानिए मुझे शादी में जाना है।"

इस तरह ये पूर्णिमा भी बिना वीडियो बनवाये ही गुज़र गई।

"रिकॉर्डिंग की हुई कितनी कविताएँ बची हैं हमारे पास?"
"तुम देखो तुम्हारे पास है?"
"मैं मैं कंप्यूटर पर देखती हूँ आप जो बच गए हैं उनका नाम लिखते हैं।"
"हम्म्म्म।"
"गिनो कितनी बची हैं?"
"छ: ..."
"बस! (अब पूर्णिमा पर वीडियो नहीं बनाया गया तो ये कविता इतवारी कविता में नहीं आ पाएगी।"
"एक काम करता हूँ उत्पल भाई को बोलता हूँ कि अपना कोई वीडियो बना कर भेज दे।"
"लेकिन बहुत से वीडियो ऐसे हो गए हैं। थोड़ा अलग हो जाएगा तो अच्छा लगेगा।"
"हाँ वो तो सही है लेकिन इमरजेंसी में अब क्या करें?"
"ठीक है।"

"उत्पल भाई को शायद समय नहीं मिल पाया। हफ़्ता हो गया उन्होंने वीडियो नहीं भेजा या शायद कभी काम की अधिकता के कारण व्यक्ति भूल भी जाता है। जैसे पिछले कितने महीनों से हम पूर्णिमा भूल रहे हैं।"

"अरे देखो चाँद कितना बड़ा और पूरा है। आज पूर्णिमा क्या है?"
"हनुमान जयंती कल है यानी पूर्णिमा भी कल है।"
"तुम्हें अभी तक कोई काम नहीं है, कहीं जाना है?"
"नहीं।"
"तो अभी तक वीडियो बना रहे हैं।"
"शैलनाथ बाबा की धूनी चलेगी?"
"नहीं, यहीं गोली मार देंगे।"
"कैसे?"
"आप ये शिला ओढ़ो और जैसा मैं कहूँ वैसा करते जाओ।"

(जैसा मैंने कहा कलाकार ने बिलकुल वैसा तो नहीं किया क्योंकि वह भी रोकने वाला, ऑर कलाकारी तो दिखानी ही थी।)

* पहले चार पँक्तियाँ गुलज़ार साहब की और बाकी सब इस नाचीज़ की।

: देश देशुम

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