क्या कर रही हैं , आखियान में काजल लगा रही है ,यो एकरनगो (काला)बदन मुओ (निगोड़ा)क्या केवेगो ,म्हारो (मेरा ) कहना मान थारी (तेरी )आखियां में धोलो (सफेद ) चुनो (चुना )सोहेगो (अच्छा ) लगेगा
*साधना श्रीवास्तवताजगी
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मेरी सुंदरता मेरा मन है
मेरी कोमलता मेरा तन है
मेरा मन ही मेरा तन है
मेरे तन की शिथिलता
शरीर की कोमलता
मेरे पुराने होने का एकमात्र संकेत
पर, मेरा मन, मेरे मस्तिष्क का अक्स है
सुकून मेरा लक्ष्य है
मैं सुख दुख में सम
संपूर्ण, सुखद, सरल
खूबसूरत मैं जीवंत नारी हूँ
*स्वाति सिंग
--------
अभी थके नही पाँव
अभी हारा नही है हौसला...
आशाओं की भौर निहार रही हूं मैं
आँखों में सजा के काजल....
खुद की नज़र उतार रही हूँ मैं......
*नम्रता सरन "सोना"
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लाल छड़ी
आंखों में कजरारी लड़ी
सजनवाकी पहने हाथो में घड़ी
मिलने को आतुर जंवा बन ,इंतज़ार में दर पर खड़ी।
*प्रभा जैन
----- -
बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम
मुहँ मे लड़खडा़ती जुबान सजने को आतुर मन ऐसे जैसे नव लेकर आई पैगाम
जज्बा और जुनून देखकर हम हो गये हेरान ।
दिल से तो है जवान ।
*मनोरमा जोशी
-----
है सोलह श्रृंगार ।मन पाखी भर ले उड़ान,दूर तलक उड़ता रहता है, नारी का मन उम्र का मौसम नहीं देखता
बचपन से लेकर बुढा़पे तक सजने -संवरने का मौसम नहीं देखता
दुर्बल तन, झुरियो के बीच मुस्कान है बाकी, जवानी का उल्लास है बाकी
मन की क्यारी में समाया है बसंत
वो चूडी़, लाली, बिंदी, काजल का
चाव नहीं छूटता
दुनिया कुछ भी कहे, लाल लिबास पहनतर इठलाने का खुमार नहीं छूटता
द्वारा -*आराधना विसावाडिया
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उम्र की चिंता नही ,मुझे सजने
का है अधिकार ।
सुंदरता तन मन की निखरी
नारीत्व का आभार।
*अचला गुप्ता
-----
तन भले बूढ़ा हो चला पर
मन आज भी जवां है जैसे
आज भी सोलवा सावन हो
मन में आज भी वही उमंग है
सोलह श्रृंगार की देखो तो सही
आज भी दुनिया से जारी जंग है
लग न जाये कहीं इस जवां दिल को नज़र
इसलिए आज भी लगाती वो सयानी, काज़ल है
पहनकर लाल साड़ी आज भी करती सबको घायल है
कलाई में पहनी घड़ी उनकी ये संदेश देती है हमें
वक़्त चाहे जो भी हो आज भी वक़्त की वो कायल है
*प्रणिता राकेश सेठिया *परी*
------
मैं सुख दुख में सम
संपूर्ण, सुखद, सरल
खूबसूरत मैं जीवंत नारी हूँ
सृष्टिचक्र की धुरी है नारी
उससे है संसार।
*अचला
🌷🌷हाथों में गर दम न होता
आंखो में काजल न डलता
झुर्रियों पे न जाना कोई
लाल रंग मुझ पे है फबता
आईना मुझको सिखाता
नारी और श्रृंगार नाता
सजना संवरना स्त्री के गुण
मृत्यु शय्या पर भी सजना
बाँधे घड़ी वो सोचती
पल पल सजूँ मन मोहती
*कुसुम सोगानी
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
पहन कर लाल लिबास,करूं मैं
सोलह सिंगार,मेरी उमंगे
अनंत अपार।
मन मे उठती लहरो को,आसमान की उँची उडान
भरने दो़
तन बूढा है तो कया
हुआ हसरतो की बौछार
होने दो।
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*साधना श्रीवास्तवताजगी
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| साधना श्रीवास्तव |
मेरी सुंदरता मेरा मन है
मेरी कोमलता मेरा तन है
मेरा मन ही मेरा तन है
मेरे तन की शिथिलता
शरीर की कोमलता
मेरे पुराने होने का एकमात्र संकेत
पर, मेरा मन, मेरे मस्तिष्क का अक्स है
सुकून मेरा लक्ष्य है
मैं सुख दुख में सम
संपूर्ण, सुखद, सरल
खूबसूरत मैं जीवंत नारी हूँ
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| स्वाति सिंग |
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अभी थके नही पाँव
अभी हारा नही है हौसला...
आशाओं की भौर निहार रही हूं मैं
आँखों में सजा के काजल....
खुद की नज़र उतार रही हूँ मैं......
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| नम्रता सरन सोना |
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लाल छड़ी
आंखों में कजरारी लड़ी
सजनवाकी पहने हाथो में घड़ी
मिलने को आतुर जंवा बन ,इंतज़ार में दर पर खड़ी।
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| प्रभा जैन |
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बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम
मुहँ मे लड़खडा़ती जुबान सजने को आतुर मन ऐसे जैसे नव लेकर आई पैगाम
जज्बा और जुनून देखकर हम हो गये हेरान ।
दिल से तो है जवान ।
*मनोरमा जोशी
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| मनोरमा जोशी |
है सोलह श्रृंगार ।मन पाखी भर ले उड़ान,दूर तलक उड़ता रहता है, नारी का मन उम्र का मौसम नहीं देखता
बचपन से लेकर बुढा़पे तक सजने -संवरने का मौसम नहीं देखता
दुर्बल तन, झुरियो के बीच मुस्कान है बाकी, जवानी का उल्लास है बाकी
मन की क्यारी में समाया है बसंत
वो चूडी़, लाली, बिंदी, काजल का
चाव नहीं छूटता
दुनिया कुछ भी कहे, लाल लिबास पहनतर इठलाने का खुमार नहीं छूटता
द्वारा -*आराधना विसावाडिया
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| आराधना |
उम्र की चिंता नही ,मुझे सजने
का है अधिकार ।
सुंदरता तन मन की निखरी
नारीत्व का आभार।
*अचला गुप्ता
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तन भले बूढ़ा हो चला पर
मन आज भी जवां है जैसे
आज भी सोलवा सावन हो
मन में आज भी वही उमंग है
सोलह श्रृंगार की देखो तो सही
आज भी दुनिया से जारी जंग है
लग न जाये कहीं इस जवां दिल को नज़र
इसलिए आज भी लगाती वो सयानी, काज़ल है
पहनकर लाल साड़ी आज भी करती सबको घायल है
कलाई में पहनी घड़ी उनकी ये संदेश देती है हमें
वक़्त चाहे जो भी हो आज भी वक़्त की वो कायल है
*प्रणिता राकेश सेठिया *परी*
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| प्रणीता राकेश सेठिया |
मैं सुख दुख में सम
संपूर्ण, सुखद, सरल
खूबसूरत मैं जीवंत नारी हूँ
सृष्टिचक्र की धुरी है नारी
उससे है संसार।
*अचला
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| अचला गुप्ता |
आंखो में काजल न डलता
झुर्रियों पे न जाना कोई
लाल रंग मुझ पे है फबता
आईना मुझको सिखाता
नारी और श्रृंगार नाता
सजना संवरना स्त्री के गुण
मृत्यु शय्या पर भी सजना
बाँधे घड़ी वो सोचती
पल पल सजूँ मन मोहती
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| कुसुम सोगानी |
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पहन कर लाल लिबास,करूं मैं
सोलह सिंगार,मेरी उमंगे
अनंत अपार।
मन मे उठती लहरो को,आसमान की उँची उडान
भरने दो़
तन बूढा है तो कया
हुआ हसरतो की बौछार
होने दो।
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| वंदना अर्गल |











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