Monday, April 22, 2019

चित्र पर आधारित लघुकथा

नम्रता सरन सोना
का करें... इतै मेघ भी न बरसे...ना ही फसल भई...पेड़ भी नंगे धरें हैं... घर में नाज का दाना नही... सो चोका बासन का करें... खाली ठीकरे लटका दिए साखों पर. .और बैठ गए खटिया पे...ऊपरवारे से करने को गुहार... दाता मेघ दे, पानी दे, दाना दे, खुसहाली दे....
मन ही मन करजिया बुदबुदा रही थी....
फिर हौले से बोली..."जी तो करत है...ठीकरों की जगा (जगह) काहे खुदई न लटक जाऊं.."
धरा ताक रही थी आसमान को....
*नम्रता सरन "सोना"*

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