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| नम्रता सरन सोना |
मन ही मन करजिया बुदबुदा रही थी....
फिर हौले से बोली..."जी तो करत है...ठीकरों की जगा (जगह) काहे खुदई न लटक जाऊं.."
धरा ताक रही थी आसमान को....
*नम्रता सरन "सोना"*
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| नम्रता सरन सोना |
एक सच्चा रिश्ता एक अच्छी किताब की तराहा होता है, कितनी भी पुरानी हो जाए, फिर भी शब्द नहीं बदलते, रास्ते बहुत मिलेंगे भटकाने के लिए, लेकिन स...
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