Thursday, April 18, 2019

विरहणी

विरहणी
बहुत बोलती थी ,सासू मां।हर बात पर टोकना। उसके किसी भी काम को कभी प्रोत्साहित नही किया। बड़ी उलझन होती थी,विमला को।
पति से विमला कोई शिकायत नही करती।वह जानती थी की वो अपनी मां के विरूद्ध कभी कुछ नहीं कहेंगे।
पहले सामूहिक परिवार में सासू मां,ससुर जी,दादा ससुर जी,देवर, नंनद सबके साथ बहुत समय रही।
अपने पति का तबादला दुसरे शहर में होने पर भी वह घर आती जाती रही।
इस बार सासू मां विमला के पास आई थी।दस पन्द्रह दिन तो कुछ बोली नहीं, लेकिन एक दिन अपने बेटे को पड़ोस में बैठा देखकर, उन्होंने मौका देखकर धीरे से विमला से कहा,देख विमला अब बार बार बबुआ को छोड़ घर न आया कर और देख बच्ची भी पढ़ने लगी है।विमला को हंसी आ गई।वह सोचने लगी हमेशा परिवार की जिम्मेदारी बताने वाली सासू मां को एकदम क्या हो गया।
सासू मां विमला का चेहरा पढ़ रही थी,बरस बीते बहू को साथ रहते।अपनी बहू की निश्चलता जानती थी वह।
बोली बहू तेरे ससुर भी शादी के बाद कभी उनके पड़ोस में बैठे रहते थे बस प्यार का नाम और क्षणिक सुख भोगने में वह ऐसे लीन हुए की में केवल बबुआ की मां बनकर रह गई।
वह हतप्रभ थी ।सासू मां ने ताड़ लिया था। उसके पति की फिसलन उसे पता नहीं चल रही थी।
वह जान गई,विरहणी मन की आंख से देखती है,सुनती है।
प्रेषिका___
माया मालवेन्द्र बधेका
७४, अलखधाम नगर
उज्जैन( मप्र)
स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित

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