बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
जिसमें खिल नहीं पाता बचपन
क्या होती माँ की लोरियाँ
क्या होती गर्म रोटियां
क्या होती रिश्तों की गर्मियां
नहीं जानता जो उपवन
क्या होता गुड्डेगुड़ियों का ब्याह
साथी संग दौड़ा नहीं जो बीच राह
गुल्ली डंडा और पतंग मांझा
क्या होता मस्तियों से रिश्ता साँझा
खेल मैदान है आसमान
गेंद बन जाती चाँद समान
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
जहाँ गुजरती सांसे किसी नुक्कड़ पर
चाय की केतली की भाप पर
छोटू छोटू की आवाज पर
बारूद के ढेर पर, तगारी की रेत पर
कचरे में खजाने की खोज पर
सपनें बुनता उधेड़ता कोरा मन
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
जिसमें बाली उमर बिन सिंदूर बनती दुल्हन
काँच टूट बिखरता दिखती न चुभन
सुबह में है साँझ की थकन
खेल है चाकू,छुरी और गन
पटाखों का तमंचा दूर गगन
धुँआ धुँआ हो रहा चमन
किसको दिखता बुझता सुलगता मन
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
जिसमें सजा जीवन का झूठा श्रृंगार
माया का अंबार ग़ुम बापू का दुलार
माँ नहीं मोबाईल है पास
कैसे बनें मीठे अहसास
किताबों में नहीं परियों की कहानी
जीवन में नहीं जीवन की रवानी
इस बालदिवस :-
बचपन को मिल जाता बचपन
सच कर लेता वो सुन्दर सपन
काव्य कृति :-
डॉ.संगीता भारुका

Beautiful chachi 😘
ReplyDeleteThank you so much 😊
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