Saturday, September 12, 2020

महादेवी वर्मा की पुण्य तिथि पर शुभसंकल्प का आयोजन

आदरणिय महादेवी वर्मा की पुण्य तिथि  पर  शुभ संकल्प  समूह द्वारा  आनलाइन  श्रद्धांजलि अर्पित  कर  समूह सदस्यों  ने  उनकी  रचना  का  पाठ  किया, इस  अवसर  पर  समूह निर्देशक  डॉ  सुनीता  श्रीवास्तव  ने  बताया  कि  महादेवी  वर्मा  की  स्मृति  में  गीत  ,भजन  भी  प्रस्तुत  किए  गए l

कार्यक्रम  में  शिरकत  करने  वाले  काव्य  वाचक  की  रचनाओं  के  अंश  प्रस्तुत  है 


🌹जो तुम आ जाते एक बार🌹


जो तुम आ जाते एकबार, 

कितनी करुणा, कितने संदेश, 

पथ में  बिछ जाते, बन पराग, 

गाता प्राणों का तार तार, 

अनुराग भरा उन्माद वाद, 

आंसु लेते थे, पग पखार,

जो तुम आ जाते एकबार, 


हस उठते पलमें आर्द्र नैन, 

धूल जाता होंठों से बिसाद, 

छा जाता जीवन में  बसंत, 

लूट जाता, चीर संचित पराग, 

आंखें देती, सर्व सुवार, 

जो तुम आ जाते एक बार, 



*पद्माक्षी शुक्ल, पुणे

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महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित जानी मानी छायावादी कवियत्री है उन्होंने प्रकृति ओर विरह पर अपनी अधिकतम रचनाएं लिखी ,महादेवी जी मेरी प्रेरणा भी है !उनका वासना से रहित प्रेम ओर उनकी काव्य रचना ओर प्रकृति के प्रति प्रेम ओर उनकी भाषा शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया! 

मैने एम, ए,हिंदी साहित्य में ,महादेवीजी के उपर थीसिस भी लिखी ! 

उनकी कुछ पंक्तियां उनके चरणों में समर्पित करती हूं 🙏! 

1"तुम दुख बन इस पथ से आना ,शुलो में नित मृदु पाटल सा खिलते देना मेरा जीवन, क्या हार बनेगा वह जिसने सिखा , न ह्रदय का बिधवाना"!

 2,"रंगमय है देव दूरी , छू तुम्हे रह जाएगी यह चित्रमय क्रीड़ा अधूरी ,दूर रहकर खेलना पर मन न मेरा मानता ,मूंद पलके रात करती जब हृदय हठ ठानता " !

3," क्या पूजा क्या अर्चन  रे,उस असीम का सुंदर मंदिर मेरा लघुतम  जीवन रे ,मेरी सांसें करती रहती नित प्रिय का अभिनंदन रे !

4"बीन भी हुं मैं तुम्हारी रागिनी भी हुं ,दूर तुमसे हूं , अखंड सुहागिनी भी हूं !

5"मेरी लघुता पर आती ,जिस दिव्य लोक को व्रीडा,उनके प्राणों से पूछो , क्या , पाल सकेंगे पीड़ा "!

6 उनसे कैसे छोटा है ,मेरा यह भिक्षुक जीवन ,उसमे अनंत करुणा है ,इसमें असीम सूनापन "!

7"कह दे मा अब क्या देखू ,देखू खिलते कमल या अधरो की लड़ियां देखु "!

इन पंक्तियों के साथ महादेवी जी के चरणों में शत शत वंदन करती हूं और अपने भावों की पुष्पांजलि इन शब्दों में इन शब्दों में अर्पित करती हूं! 


"जब तक ये धरा ओर आसमान रहेगा ,हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कवियत्री महादेवी जी आपका नाम रहेगा ,तुम्हारे काव्य में को टिस,दर्द वेदना है ,उस काव्य का सदा सम्मान रहेगा "! 

*साधना  श्रीवास्तव 

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महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित जानी मानी छायावादी कवियत्री है उन्होंने प्रकृति ओर विरह पर अपनी अधिकतम रचनाएं लिखी ,महादेवी जी मेरी प्रेरणा भी है !उनका वासना से रहित प्रेम ओर उनकी काव्य रचना ओर प्रकृति के प्रति प्रेम ओर उनकी भाषा शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया! 

मैने एम, ए,हिंदी साहित्य में ,महादेवीजी के उपर थीसिस भी लिखी ! 

उनकी कुछ पंक्तियां उनके चरणों में समर्पित करती हूं 🙏! 

1"तुम दुख बन इस पथ से आना ,शुलो में नित मृदु पाटल सा खिलते देना मेरा जीवन, क्या हार बनेगा वह जिसने सिखा , न ह्रदय का बिधवाना"!

 2,"रंगमय है देव दूरी , छू तुम्हे रह जाएगी यह चित्रमय क्रीड़ा अधूरी ,दूर रहकर खेलना पर मन न मेरा मानता ,मूंद पलके रात करती जब हृदय हठ ठानता " !

3," क्या पूजा क्या अर्चन  रे,उस असीम का सुंदर मंदिर मेरा लघुतम  जीवन रे ,मेरी सांसें करती रहती नित प्रिय का अभिनंदन रे !

4"बीन भी हुं मैं तुम्हारी रागिनी भी हुं ,दूर तुमसे हूं , अखंड सुहागिनी भी हूं !

5"मेरी लघुता पर आती ,जिस दिव्य लोक को व्रीडा,उनके प्राणों से पूछो , क्या , पाल सकेंगे पीड़ा "!

6 उनसे कैसे छोटा है ,मेरा यह भिक्षुक जीवन ,उसमे अनंत करुणा है ,इसमें असीम सूनापन "!

7"कह दे मा अब क्या देखू ,देखू खिलते कमल या अधरो की लड़ियां देखु "!

इन पंक्तियों के साथ महादेवी जी के चरणों में शत शत वंदन करती हूं और अपने भावों की पुष्पांजलि इन शब्दों में इन शब्दों में अर्पित करती हूं! 


"जब तक ये धरा ओर आसमान रहेगा ,हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कवियत्री महादेवी जी आपका नाम रहेगा ,तुम्हारे काव्य में को टिस,दर्द वेदना है ,उस काव्य का सदा सम्मान रहेगा "! 



मुरछाया फूल


था कली के रूप शैशव मै , अहो सुखे फूल ।

हास्य करता था , खिलाती अंक में  तुझको  पवन ।

खिल गया  जब पूर्ण  तू मंजूल सुकोमल पुष्पवर ।

लुब्ध मधु के हेतू  मंडराते लंगे आने भ्रमर ।

स्निग्ध किरणे  चंद्र की तुझको हँ साती थीं सदा ।

रात तुझ पर वारती थीं मोतियों की संपदा ।

लोरियों गाकर मधूप निंद्रा विवश करते तुझे ।

यत्न माली का रहा आनंद से भरता तुझे ।


*चारूमित्रा नागर


===================


साहित्य सेवा में जिसने 

सारा जीवन अपना होम किया

छायावाद  को नई दिशा 

और दृष्टी से समृध्द किया

नारी की वेदना पर जिसने 

अपनी कलम चलायी

मैं नीर भरी दुःख की बदली,निहार,नीरजा और यामा जैसी रचनाओं का जिसने उत्कृष्ट सृजन किया

नारी जीवन को जिसने अपनी रचनाओं में ऊँचा स्थान दिया

'आधुनिक मीरा'बनकर जिसने साहित्य का विस्तार किया

अपने महान कर्मों से 'महादेवी'

ने अपने नाम को सार्थक कियाII

                     *डा.  नंदिनी जोशी

==========================

                         


अपने नाम को सार्थक करती

आप देवी महान

आधुनिक मीरा से सम्मानित

साहित्य जगत की शान


तारीख छबबीस, माह मार्च

 वर्ष उन्निसस्सो सात

भारत भूमि धन्य हुई पाकर

 देवी रूपी कन्या की सौगात


रंग पर्व पर अवतरीत

बिखेरे साहित्यिक रंग हजार

नारी चेतना, पीड़ा, श्रंगार

से रचा अद्भुत संसार


जीव दया,जीव प्रेम भी था

साहित्य सागर में समाया

दया ,करुणा,समाज सेवा

का सुंदर पाठ पढ़ाया



अग्नि रेखा ,आत्मिका, सप्तपर्णा

नीरजा,गील्लू ,श्रृंखला की कड़ियां

सात भूमिकाएं व निलांबरा

 यामा जैसी दीपों की लड़ियां


 प्रणय, वेदना, करुणा के दर्शन

 रश्मि, संधिनी और संस्मरण

 दीप गीत, श्रेष्ठ गीत, पथ के साथी

 से भरी रचनाओं की सजी सुंदर थाती



 कालिदास समारोह उज्जैन में

 साक्षात् दर्शन के हर पल

मुझे याद है, विद्वता युक्त  चेहरा

सहज सौम्य और सरल


अथाह भीड़ कड़ी सुरक्षा थी

मन था  मिलने को तत्पर

किसी अदृश्य मदद ने  जैसे

मुझे छोड़ा आपके पास लाकर



छोटे से कागज के पुर्जे पर

आपके पाए थे अनमोल हस्ताक्षर

दादी नानी के कोमल हाथो सा

सिर पर पाया स्पर्श ,हुआ में साक्षर


लेखनी पकड़ अपने हाथों से

 दिया था आशीर्वाद व प्यार

 धरोहर यही है मेरे जीवन की

 ज्ञान ही जीवन का सार



ग्यारह सितम्बर वर्ष सीत्यासी

किया महा प्रयाण

 ज्ञान की गंगा का शिव की गंगा में

हुआ मिलन महान


छायावाद की काव्य साधना

शिक्षा जगत की प्रबल प्रेरणा

काव्यांजलि अर्पित करता मन

कमल चरणों में शत शत नमन


 *डॉ विजय आर चौरे* 


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कमरे में लगे एक शीशे के सामने बैठे उसे देर हो गई थी। जरीदार साड़ी, हाथों में काली चुड़ियाँ, सिर पर सिंदुर की लाल रंग की रेखा। शरीर पर आभूषण सब कुछ उसे नववधु होेने की पहचान दे रहे थे। किमती सामानों से भरापूरा कमरा ऐश्वर्यवान होने का प्रमाण दे रहा था। साथ ही कमरे रखी पुस्तकें यह दर्शा रही थी कि उस पर माँ सरस्वती की कृपा है। 

धन एश्वर्य विद्या के बावजूद भी वह उदास थी। दर्पण में  देख कर सोच रही थी कि सौंदर्य किसे कहते है? वह सुंदर नहीं थी पर कुरुप भी नहीं कहा जा सकता है। प्रश्न कर रही थी स्वयं से क्या सुंदर नाक नक्श गोरी त्वचा को सुंदर कहा जाता है। क्या गुणों की पहचान कुछ नहीं होती? उसने अपने से फिर प्रश्न किया। संगमरमर देह यष्टि जो अपने ज्वाला से अनेको को झुलसा दे या फिर वह गुण जिन के कृतित्वों के कारण अनेक जिंदगियाँ विकसित हो, दोनों में से उसे एक चुनना है। 

निर्णय तो हो चुका था पति ने साफ कह दिया था कि मैं तुम्हे साथ नहीं रख सकता। उसकी दृष्टि में शरीर के अलावा और कुछ था ही नहीं यदि होता तो वह यह शब्द नहीं कहते। अचाानक घड़ी की ओर देखा मन ने कहा - आने वाले होंगे। नारी सदियों से ही पुरुष के हाथों से खिलौना रही थी। दरवाजे पर कदमांे की आहट सुनाई दी। गठीले शरीर के एक युवक ने प्रवेश किया। जिसके मुख मण्डल पर पुरुष होने का गौरव झलक रहा था। उसने एक नजर देखा और पूछा --‘क्या फेैसला किया तुमने?’

घुटन या संघर्ष महादेवी जी पहले ही संघंर्ष चुन चुकी थी। पति का निर्णय अटल इसलिए उन्होंने बंधनों से मुक्ति पा ली थी। साहित्यिक जगत में अपने भावों में संपूर्ण ब्रह्माण्ड के सौंदर्य को सजाऐ हुए वह सौंदर्य की देवी सदा सदा के लिए अमरत्व प्राप्त कर गई।

 

*डा.सुरेखा भारती

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 विरह - वेदना की अप्रतिम गायिका -- महादेवी वर्मा छायावादी रचनाकारों ---- पंत , निराला , प्रसाद की श्रृंखला की एक सशक्त कड़ी और साहित्य में अपने योगदान के लिए कभी ना मिटने वाला हस्ताक्षर हैं । 

बाल्यवस्था में ही विवाह बंधन में बंधी कवि ह्रदया महादेवी जी का गृहस्थ जीवन लम्बी आयु ना पा सका पति से उनका अलगाव हो गया । उसके बाद उन्होनें अपनी आगे की पढ़ाई तथा स्वतंत्र लेखन  

आरम्भ किया । 

 उनकी लेखनी में एक टीस है विछोह की ( शायद अधूरे दाम्पत्य जीवन के कारण ) जो उन्हें भक्ति रस में रा रंगी कृष्ण के प्रेम में रमी 

आधुनिक मीरा का स्थान दे देती है । वे स्वयं कृष्ण की अनन्य भक्त थीं ।

पशु - पक्षियों से भी उनको अगाध प्रेम था उनका घर परित्यक्त जानवरों की आश्रय स्थली था ।

शास्त्रीय गायक स्वर्गीय पंडित जसराज ने अपने ऊपर लिखी डॉक्टर सुनीता बुद्धिराजा की किताब में महादेवी जी के बारे में अपने उद्गगार व्यक्त किये हैं ----- 

महादेवी जी पंडित जी को अपना अनुज मानती थी और इसी नाम से उन्हें संबोधित भी करतीं थीं , कोलकाता के उनके एक प्रोग्राम में महादेवी जी भी उपस्थित थी एक श्रोता के रूप में , बाद में इलाहाबाद में जब पंडित जसराज उनसे मिलने गए तो बोली --- अनुज तुम गाते तो बहुत अच्छा हो पर अपने गाने में थोड़ी भावना लाओ प्यार करो उससे । बाद में पंडित जी ने उस पर विचार किया और पाया वो पानी के किनारे ही खड़ें है उतरे नही है उसमें , महादेवी जी कही बात उन्हें समझ  मे आ गयी थी उसको पंडित जसराज ने पकड़ कर गाने में सुधार किया । उसके बाद उनका गाना मस्तिष्क के साथ - साथ सुनने वालों के दिलों में भी गहरे उतर गया ।

नाम के अनुरूप महादेवी वर्मा भावनाभूतियों की भी महादेवी थीं 

उनकी पुण्यथिति पर मैं उन्हें श्रद्धानवत हो नमन करती हूँ ।

*शालिनी 

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दिव्य अलौकिक शब्द साधना,

जीवन यथार्थ चित्रण लिए खड़ी।

छायावाद का  थी आधार स्तंभ,

मधु शब्द ज्वाला रश्मि  लिए खड़ी।

अतीत के चलचित्र की परिक्रमा,

मधु शब्दों का महासागर लिए खड़ी।

त्याग प्रेम समर्पण का भाव भरा,

आधुनिक मीरा की भक्ति  लिए खड़ी।

       * मधु वैष्णव "मान्या"जोधपुर राजस्थान

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कलम की धार से मानवीय

संवेदनाओं को उकेरा ।

नारीत्व की गरिमा को 

कोरे कागज पर बिखेरा।

भारतीय साहित्य का 

गौरव थीं साहित्यकारा ।

शब्दों से रचतीं थीं भावनाओं

का संसार सारा 

जिनकी रचना हर लेती थी ,

पल में हर मन का तम

उन महादेवी जी को

करते है शत शत नमन।


*अचला गुप्ता

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साहित्य सेवा में जिसने 

सारा जीवन अपना होम किया

छायावाद  को नई दिशा 

और दृष्टी से समृध्द किया

नारी की वेदना पर जिसने 

अपनी कलम चलायी

मैं नीर भरी दुःख की बदली,निहार,नीरजा और यामा जैसी रचनाओं का जिसने उत्कृष्ट सृजन किया

नारी जीवन को जिसने अपनी रचनाओं में ऊँचा स्थान दिया

'आधुनिक मीरा'बनकर जिसने साहित्य का विस्तार किया

अपने महान कर्मों से 'महादेवी'

ने अपने नाम को सार्थक कियाII

                  *   डा.  नंदिनी जोशी

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साहित्य की कवयित्री और थीं लेखिका 

विलक्षण प्रतिभा की धनी इस युग की मीरा 

छायावादी युग की थीं वो प्रमुख स्तम्भ 

लेखनी में लिखें दुःख पढ़ने वाले हो जाते दंग 

वे रहेंगी हमारे बीच ध्रुव तारे सी प्रकाशमान 

निहार से सप्तपर्णो तक चंद्रकांता मणि समान 

रचनाओं ने किया समाज की मानसिकता पर प्रहार 

स्त्री अत्याचार पर लिख किया लेखनी से संहार 

*मंजिरी पुणताम्बेकर 

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*साहित्य जगत कीअनुपम सितारा*।

*भक्तिन का दिया आपने अपना सहारा*।

*आधुनिक मीरा को है हमारा वन्दन*।

 *साहित्य की महादेवी को हमारा नमन* ।


*ज्ञान, कर्म,विरह,वैराग्य का संगम*।

*भावनाओं से छूती सोना हिरणी का मर्म*।

*करुणा की बहाती हो ऐसी अनुपम धारा*।

*करती हो सृजन यामा, नीरजा और निहारा*।


*मीना जैन दुष्यंत भोपाल

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ना मिट सकोगी

  साहित्याकाश का चमकीला ध्रुवतारा हो

  गगन में चंदा का उजियारा हो

  सूरज का तेज अलौकिक प्रकाश हो

भूल ना पाएंगे जो भी हो।

रचनाओं से साहित्य सागर समृद्ध किया

  सृजन लहरों ने कभी शंख दिया

  तो कभी सीपों का मोती दिया

  अनमोल रत्नों का भंडार सौंप दिया।

  कई वर्षों में ऐसी ज्योति मिलती

  जिसकी आभा कभी भी नहीं मिटती

 ज्ञान ,कला वैराग्य का संगम बनती

  ऐसी त्रिवेणी भला कहां है मिलती।

  सदियों तक याद सभी को रहोगी

  दया ,करूणा का पाठ पढा़ती रहोगी

  सवके दिलों पर राज करती रहोगी

रस भरी बदली मिट ना सकोगी ।

  *नीति अग्निहोत्री

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प्रिय सुधि भूले री,

मै पथ भूली ।

मेरे ही मृदु उर में हस बस

श्वासों में भर मादक मधु रस ,

लघु कलिका के चल ,

परिमल से ,

वे नभ छाये री मैं वन फूली ।

प्रिय सुधि भूले री मैं

पथ भूली ।

तज उनका गिरी सा ,

गुरु अंतर ,

मैं सिकता कण सी ,

आयी झर ।

आज सजनी उनसे ,

परिचय क्या ?

वे घन चुम्बित मैं पथ भूली ।


*  मनोरमा जोशी 

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26 मार्च होली के दिन अवतरित,एक चमकता सितारा,हीरे सी आभा बिखेरती हुई प्रतिभावान"माँ सरस्वती- मीरा के नाम से प्रख्यात ऐसी आदरणीय महादेवी वर्मा को यह साहित्य संसार हमेशा याद रखेगा।पदम् भूषण,विभूषण,ज्ञानपीठ सम्मान  प्राप्त उपन्यासकार कवियत्री पूज्यनीय महादेवीजी ने अपनी पीड़ा ,रचनाओं केमाध्यम से समाजमें संवेदना मयी दृष्टि प्रदान की।स्नेह श्रृंगार सजी नारी चेतना,तथा समाज कल्याण के विषय दीपशिखा बन प्रकाश डाला।ऐसी महान साहित्यकार आदरणीय महादेवीजी को उनकी पुण्य तिथि पर शत शत नमन🙏🏻नमन

  * प्रभा जैन इंदौर

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महादेवी जी वर्मा हिंदी के विशाल मन्दिर की सरस्वती थी छायावादी युग की प्राण थी भावुकता एवम् करूणा उनके बहुमुखी कार्यों की पहचान है इसीलिए उन्हें आधुनिक युग की मीरा के नाम से जाना जाता है हिन्दी कविता में वे एक महत्व पूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। उनके काव्य में प्रणय,वेदना,करूणा,रहस्यवाद,छायावाद के एक साथ दर्शन होते है गीत काव्य में उनका स्थान सर्वोपरि हैवे अद्भुत व्यक्तित्व की धनी थी उनके व्यक्तित्व में संवेदना, दृदता,आक्रोश का अद्भुत संतुलन मिलता है। वो एक सफल अध्यापक, कवियत्री,गद्य कार,कलाकार,समाजसेवी,विदुषी के बहुरंगी मिलन का जीता जागता उदाहरण थी,उनकी काव्य साधना के लिए हिंदी साहित्य जगत हमेशा उनका ऋणी रहेगा। ऐसी महान साहित्य कार के चरणों में शत शत नमन।

                  *   नवनीत जैन

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अपने नाम को सार्थक करती

आप देवी महान

आधुनिक मीरा से सम्मानित

साहित्य जगत की शान


तारीख छबबीस, माह मार्च

 वर्ष उन्निसस्सो सात

भारत भूमि धन्य हुई पाकर

 देवी रूपी कन्या की सौगात


रंग पर्व पर अवतरीत

बिखेरे साहित्यिक रंग हजार

नारी चेतना, पीड़ा, श्रंगार

से रचा अद्भुत संसार


जीव दया,जीव प्रेम भी था

साहित्य सागर में समाया

दया ,करुणा,समाज सेवा

का सुंदर पाठ पढ़ाया



अग्नि रेखा ,आत्मिका, सप्तपर्णा

नीरजा,गील्लू ,श्रृंखला की कड़ियां

सात भूमिकाएं व निलांबरा

 यामा जैसी दीपों की लड़ियां


 प्रणय, वेदना, करुणा के दर्शन

 रश्मि, संधिनी और संस्मरण

 दीप गीत, श्रेष्ठ गीत, पथ के साथी

 से भरी रचनाओं की सजी सुंदर थाती



 कालिदास समारोह उज्जैन में

 साक्षात् दर्शन के हर पल

मुझे याद है, विद्वता युक्त  चेहरा

सहज सौम्य और सरल


अथाह भीड़ कड़ी सुरक्षा थी

मन था  मिलने को तत्पर

किसी अदृश्य मदद ने  जैसे

मुझे छोड़ा आपके पास लाकर



छोटे से कागज के पुर्जे पर

आपके पाए थे अनमोल हस्ताक्षर

दादी नानी के कोमल हाथो सा

सिर पर पाया स्पर्श ,हुआ में साक्षर


लेखनी पकड़ अपने हाथों से

 दिया था आशीर्वाद व प्यार

 धरोहर यही है मेरे जीवन की

 ज्ञान ही जीवन का सार



ग्यारह सितम्बर वर्ष सीत्यासी

किया महा प्रयाण

 ज्ञान की गंगा का शिव की गंगा में

हुआ मिलन महान


छायावाद की काव्य साधना

शिक्षा जगत की प्रबल प्रेरणा

काव्यांजलि अर्पित करता मन

कमल चरणों में शत शत नमन


 *डॉ विजय आर चौरे* 

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मैं नीर भरी दु:ख की बदली!


स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,

क्रन्दन में आहत विश्व हंसा,

नयनों में दीपक से जलते,

पलकों में निर्झरिणी मचली!


मेरा पग-पग संगीत भरा,

श्वासों में स्वप्न पराग झरा,

नभ के नव रंग बुनते दुकूल,

छाया में मलय बयार पली,


मैं क्षितिज भॄकुटि पर घिर धूमिल,

चिंता का भार बनी अविरल,

रज-कण पर जल-कण हो बरसी,

नव जीवन अंकुर बन निकली!


पथ को न मलिन करता आना,

पद चिन्ह न दे जाता जाना,

सुधि मेरे आगम की जग में,

सुख की सिहरन बन अंत खिली!


विस्तृत नभ का कोई कोना,

मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली!


 *शिव कुमार  दुबे 

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कमरे में लगे एक शीशे के सामने बैठे उसे देर हो गई थी। जरीदार साड़ी, हाथों में काली चुड़ियाँ, सिर पर सिंदुर की लाल रंग की रेखा। शरीर पर आभूषण सब कुछ उसे नववधु होेने की पहचान दे रहे थे। किमती सामानों से भरापूरा कमरा ऐश्वर्यवान होने का प्रमाण दे रहा था। साथ ही कमरे रखी पुस्तकें यह दर्शा रही थी कि उस पर माँ सरस्वती की कृपा है। 

धन एश्वर्य विद्या के बावजूद भी वह उदास थी। दर्पण में  देख कर सोच रही थी कि सौंदर्य किसे कहते है? वह सुंदर नहीं थी पर कुरुप भी नहीं कहा जा सकता है। प्रश्न कर रही थी स्वयं से क्या सुंदर नाक नक्श गोरी त्वचा को सुंदर कहा जाता है। क्या गुणों की पहचान कुछ नहीं होती? उसने अपने से फिर प्रश्न किया। संगमरमर देह यष्टि जो अपने ज्वाला से अनेको को झुलसा दे या फिर वह गुण जिन के कृतित्वों के कारण अनेक जिंदगियाँ विकसित हो, दोनों में से उसे एक चुनना है। 

निर्णय तो हो चुका था पति ने साफ कह दिया था कि मैं तुम्हे साथ नहीं रख सकता। उसकी दृष्टि में शरीर के अलावा और कुछ था ही नहीं यदि होता तो वह यह शब्द नहीं कहते। अचाानक घड़ी की ओर देखा मन ने कहा - आने वाले होंगे। नारी सदियों से ही पुरुष के हाथों से खिलौना रही थी। दरवाजे पर कदमांे की आहट सुनाई दी। गठीले शरीर के एक युवक ने प्रवेश किया। जिसके मुख मण्डल पर पुरुष होने का गौरव झलक रहा था। उसने एक नजर देखा और पूछा --‘क्या फेैसला किया तुमने?’

घुटन या संघर्ष महादेवी जी पहले ही संघंर्ष चुन चुकी थी। पति का निर्णय अटल इसलिए उन्होंने बंधनों से मुक्ति पा ली थी। साहित्यिक जगत में अपने भावों में संपूर्ण ब्रह्माण्ड के सौंदर्य को सजाऐ हुए वह सौंदर्य की देवी सदा सदा के लिए अमरत्व प्राप्त कर गई।

 

*डा.सुरेखा भारती


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महादेवी वर्मा

कहलायी आधुनिक मीरा

था शुभ दिवस

हुई अवतरित धरा पर जब

छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ सात,

दिया साहित्य को हीरा अनमोल

हेमा रानी गोद में...

खेलती, हुई पुष्पित।

पिता गोविन्द दास का

   मिला स्नेह भरपूर।

आजादी की दीवानी वह,

लिखी गीत जोशीली।

उपन्यासकार थी अद्भुत,

पुजारी थी अद्वितीय,

विशाल मंदिर साहित्य के

यम, नीरजा,मेरा परिवार

है साहित्य जगत के धरोहर।

आया अंधेरा हिन्द में

ग्यारह सितम्बर उन्नीस सौ बयासी

पंचतत्व में महान देवी समायी।

झुकता है शीश हमारा,

उनका पदचिन्ह दे सहारा।


        *  रीतु प्रज्ञा

        

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*आधुनिक मीरा श्रीमती महादेवी वर्मा जी का जन्म होली के दिन 24 मार्च सन 1907 ईस्वी को फर्रुखाबाद में हुआ था। उनके पिता श्री गोविंद प्रसाद वर्मा प्रतिष्ठित कवि थे और माता श्रीमती हेम रानी देवी कवियत्री थीं 9 वर्ष की बाल्यावस्था में ही श्री स्वरूप नारायण वर्मा से उनका विवाह हो गया। विवाह उपरांत उनकी विद्यालयीय शिक्षा गतिशील न रह सकी। उनका पारिवारिक जीवन सुखमय ना रहा। बाद में उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से एम ए संस्कृत की परीक्षा ससम्मान प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वे बहुत समय तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या रहीं। वे मधुर गीत लेखिका के रूप में साहित्य सर्जन करने लगीं। हार्दिक वेदना एवं स्नेह को उन्होंने निरीह जीवों पर विकीर्ण किया। वे छायावादी सशक्त गीतकार के रूप में उभरकर आयीं तथा आधुनिक युग की मीरा कहलायीं। वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या भी रहीं। सरकार ने उन्हें 1956 ईस्वी में पद्मभूषण की उपाधि से विभूषित किया।*

*यद्यपि महादेवी वर्मा कवयित्री के रूप में लोकप्रिय हैं, परन्तु वे एक सशक्त गद्य लेखिका भी थीं। यद्यपि काव्य में वे कल्पना के पंख लगाकर आकाशविहारिणी हैं, लेकिन गद्य में वे पथरीली और ऊबड़-खाबड़ यथार्थ की भूमि पर उतर आयी है। अत: काव्य के अतिरिक्त गद्य के क्षेत्र में भी उनकी देन कम नहीं है। हिन्दी-जगत की यह साभिका 11 सितम्बर, सन् 1987 ई० को चिरनिद्रा में लीन हो गयीं।*

*महादेवी वर्मा अपने जीवन के प्रारम्भिक काल से ही हिन्दी साहित्य की सेवा में संलग्न रहीं। तन्होंने गद्य तथा पद्य दोनों क्षेत्रों में ही रचना की है। उन्हें सन् १९३६ ई. में ‘नीरजा’ पर सेकसरिया पुरस्कार, सन् १९४० ई. में ‘यामा’ पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक और सन १९८२ ई. में ‘माया एवं ‘दीपशिखा’ पर साहित्य का स्वच्छ ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। वे आधुनिक मीरा के रूप में तीव्र वेदना लेकर गीत-जगत में अवतीर्ण हुई। अदृष्ट प्रियतम के प्रति ललक, उत्कण्ठा एवं मिलन के भाव उनके मन में बने रहे, फिर भी वे विरह में डूबी रहीं।


*चित्रगुप्त समाज भोपाल*

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हिंदी पखवाड़े पर इंदौर संघ लेखिकाओ के पसंदीदा पुस्तकों पर विचार

एक सच्चा रिश्ता एक अच्छी किताब की तराहा होता है,  कितनी भी पुरानी हो जाए, फिर भी शब्द नहीं बदलते, रास्ते बहुत मिलेंगे भटकाने के लिए, लेकिन स...