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| वसुमती चतुर्वेदी |
उस दिन पहली बार मुझे उनके साथ स्कूल जाना था। माँ ने सुबह ही जल्दी उठाकर तैयार कर दिया। मेरे बस्ते में एक पुस्तक ,स्लेट और लिखने के लिए छोटी पेम रख दी।
बाबूजी ने मुझे अपनी साइकिल के आगे डंडे पर बैठाया और निकल पड़े। जुलाई का महीना था, मौसम भी अच्छा था। सड़क के आस-पास खेतों में मनोरम हरियाली फैली हुई थी। ठंडी हवा चल रही थी। जैसे ही हम स्कूल पहुँचे। स्कूल के बच्चों ने हमे घेर लिया। और सभी मास्टर साहब नमस्ते! कहकर अभिवादन करने लगे। बच्चे मुझे देखने लगे।
वैसे बचपन में पढ़ने में मेरी विशेष रुचि नहीं थी। बाबूजी ने मुझे अद्यापिका के साथ पहली कक्षा में भेज दिया। अद्यापिका ने मुझे स्लेट पर हिंदी वर्णमाला लिखने के लिए कहा। मैंने थोड़ा बहुत लिखा और पेम नाक में डालने लगी और पेम नाक में चली गई। मैं घबरा गई । अद्यापिका ने कोशिश की मुझे कहने लगी झटके से साँस बाहर छोड़ो । मैं भी प्रयत्न करने लगी। बाबूजी भी आ गए, सभी बच्चे एकत्रित हो गए कुछ तो दौड़कर अपने पिताजी आदि को बुला लाए। मैं भी बच्ची थी कभी साँस अंदर ले लेती तो पेम अंदर चली जाती। 10-15 मिनट तक यह सब चलता रहा। उस समय मुझे जोर जोर से सांस बाहर छुड़वाई गई। इस तरह अनजाने में ही कपालभाति कर पेम बाहर आई और सबने चैन की साँस ली। आज भी उस घटना को याद कर हंसी आ जाती है।
वसुमति चतुर्वेदी
इंदौर


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